छुप के आता है कोई ख़ाब चुराने मेरे
शायरी | ग़ज़ल चाँद शुक्ला 'हदियाबादी'1 Mar 2019
छुप के आता है कोई ख़ाब चुराने मेरे
फूल हर रात महकते हैं सिरहाने मेरे
बंद आँखों में मेरी झाँकते रहना उनका
शब बनाती है यूँ ही लम्हे सुहाने मेरे
जब भी तन्हाई में मैं उनको भुलाने बैठूँ
याद आते हैं मुझे गुज़रे ज़माने मेरे
जब बरसते हैं कभी ओस के क़तरे लब पर
मेरी पलकों से छलकते हैं पैमाने मेरे
याद है काले गुलाबों की वोह ख़ुशबू अब तक
तेरी ज़ुल्फ़ों से महक उट्ठे थे शाने मेरे
दर बदर ढूँढते फिरते तेरे क़दमों के निशान
तेरी गलियोँ में भटकते हैं फ़साने मेरे
चाँद सुनता है सितारों की ज़ुबां से हर शब
साज़े मस्ती में मोहब्बत के तराने मेरे
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