जब पुराने रास्तों पर से कभी गुज़रे हैं हम
शायरी | ग़ज़ल चाँद शुक्ला 'हदियाबादी'1 Mar 2019
जब पुराने रास्तों पर से कभी गुज़रे हैं हम
क़तरा क़तरा अश्क बन कर आँख से टपके हैं हम
वक्त के हाथों रहे हम उमर भर यूँ मुन्त्शर
दर ब दर रोज़ी की खातिर चार सू भटके हैं हम
हमको शिकवा है ज़माने से मगर अब क्या कहें
ज़िन्दगी के आखिरी अब मोड़ पर ठहरे हैं हम
याद मैं जिसकी हमेशा जाम छ्लकाते रहे
आज जो देखा उसे खुद जाम बन छलके हैं हम
एक ज़माना था हमारा नाम था पहचान थी
आज इस परदेस मैं गुमनाम से बैठें हैं हम
"चाँद" तारे थे गगन था पंख थे परवाज़ थी
आज सूखे पेड़ की एक डाल पे लटके हैं हम
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