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एकतरफ़ा प्रेम और एक अधूरा गीत

 

यह बात 1988 की है। मैं तब बारहवीं कक्षा का छात्र था न अनुभवों का कोई विस्तार था, न ही जीवन की कोई विशेष दिशा। दिल्ली के उस पुराने महल्ले में, जहाँ मेरा स्कूल था, सरकारी विद्यालयों के नाम नहीं, केवल नंबर होते थे जैसे बाल विद्यालय क्रमांक 1 या बालिका विद्यालय क्रमांक 3। 

हमारा जीवन सरल था, लगभग सपाट न कोई बड़ी आकांक्षा, न कोई गहरी उलझन। पढ़ाई में मन कम ही लगता, पर जैसे-तैसे पास हो ही जाते थे। हमारी शरारतें गली-कूचों तक सीमित थीं क्रिकेट, पतंगबाज़ी और कभी-कभार सिनेमा। 

इसी सपाट जीवन में एक दिन हलचल मची जब मेरे सहपाठी बेचू को अपने ही महल्ले की एक लड़की, राधा से एकतरफ़ा प्रेम हो गया। राधा पास के कन्या विद्यालय में पढ़ती थी। दोनों का स्कूल जाने का समय लगभग एक ही था और शायद वहीं से यह प्रेम अंकुरित हुआ। 

बेचू ने कई दिनों तक साहस बटोरने की कोशिश की। अंततः एक दिन उसने राधा से अपने मन की बात कह दी। पर राधा ने न केवल उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया, बल्कि उसे डाँट भी दिया और दोबारा ऐसा करने पर शिकायत की धमकी भी दे डाली। 

उस दिन स्कूल की छुट्टी के बाद बेचू मुझे एक कोने में ले गया। उसकी आँखों में आँसू थे। वह टूटा हुआ था। मुझे उस पर थोड़ी दया आई, पर मन ही मन उसकी हालत पर हँसी भी आ रही थी। 

इसके बाद बेचू ने मुझे रोज़ जलेबी, समोसे और पकोड़े खिलाने का सिलसिला शुरू कर दिया शायद सांत्वना के बदले में। धीरे-धीरे दूसरे मित्र भी इस “सांत्वना सभा” में शामिल हो गए। हम सब मुफ़्त के नाश्ते का आनंद लेने लगे। 

समय बीतता गया। बेचू के प्रेम प्रयास विफल होते रहे, पर उसकी उम्मीदें बनी रहीं। 

इसी बीच उसकी बड़ी बहन का विवाह तय हो गया। महल्ले के सभी लोगों को निमंत्रण भेजा गया और राधा का परिवार भी आमंत्रित था। बेचू को लगा कि यह अवसर उसके प्रेम को फिर से अभिव्यक्त करने का हो सकता है। 

विवाह की शाम थी। हम सभी मित्र आयोजन में मौजूद थे। बारात अभी पहुँची नहीं थी, पर मेहमान आ चुके थे। राधा अपने परिवार के साथ अगली पंक्ति में बैठी थी और मंच पर चल रहे गीतों का आनंद ले रही थी। 

तभी किसी शरारती मित्र ने बेचू को उकसाया, “क्यों न तू मंच पर जाकर कोई गीत गा दे? राधा के लिए!” 

बेचू को यह विचार बहुत भाया। थोड़ी ही देर में मंच से घोषणा हुई—“अब दूल्हे के छोटे भाई एक गीत प्रस्तुत करेंगे।” 

तालियों की गूँज के बीच बेचू मंच पर पहुँचा। उसने बड़ों से कुछ कहा और फिर एक भावनाओं से भरा गीत गाना शुरू किया:

“फ़लक पे जितने सितारे हैं वो भी शरमाएँ, 
ओ देने वाले, मुझे इतनी ज़िंदगी दे दे . . . 
यही सज़ा है मेरी मौत ही न आए, 
किसी को चैन मिले, मुझको बेचैनी दे दे . . .” 

शायद वहाँ बैठे अधिकांश लोगों को इस गीत का मर्म समझ नहीं आया होगा, पर हम मित्र जानते थे यह गीत किसके लिए था। कुछ तो हँसी रोक नहीं पा रहे थे। 

लेकिन तभी, एक क्रोधित व्यक्ति मंच पर आया। उसने बेचू से माइक छीना, उसे ज़मीन पर फेंका और बेचू को धक्का देकर मंच से नीचे उतार दिया। 

हम सब पहले तो स्तब्ध रह गए। फिर बेचू की दशा देखकर हँसी आ गई। बेचू रो रहा था। हमने उसे ढाढ़स बँधाया और पूछा,  “वह कौन था?” 

बेचू ने ग़ुस्से में एक मोटी गाली दी और कहा चाचा! 

चाचा जी को गीत का चयन अनुचित लगा था। पर बेचू के लिए वह केवल एक गीत नहीं था वह उसका प्रेम था, जो अब सबके सामने अपमान में बदल चुका था। 

कुछ समय बाद बारात आ गई और सब फिर से विवाह की तैयारियों में लग गए। 

अगले दिन यह घटना पूरे विद्यालय में चर्चा का विषय बनी रही। पर बेचू पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह अब भी राधा की बातें करता, और हम अब भी उसके साथ जलेबी, पकोड़े और समोसे का आनंद लेते। 

वर्षों बाद, व्हाट्सएप के माध्यम से बेचू से फिर संपर्क हुआ। वह अब अपने पिता के व्यवसाय में लगा है और दिल्ली में ही है । राधा का अब कोई पता नहीं और बेचू एक सम्मानित प्रौढ़ है ।

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