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राम-लीला

मैं दिल्ली में पला-बढ़ा हूँ और दक्षिण दिल्ली के मुनिरका गाँव में वर्षों तक रहा हूँ। मेरे बहुत से जाट मित्र रहे हैं। हरियाणवी मैं ठीक-ठाक बोल और समझ लेता हूँ। यह घटना गाँव की रामलीला से संबंधित है। रामलीला के पात्र महल्ले के ही बच्चे और युवक होते थे, जबकि प्रौढ़ लोग निर्देशन, मार्गदर्शन, संगीत और वित्त आदि का कार्य करते थे। 

इस रामलीला में दो कलाकार सगे भाई थे। उनमें से एक हनुमान जी बना था और दूसरा वानर सेना में किसी पात्र का अभिनय कर रहा था, जो अब मुझे याद नहीं है। उन भाइयों के पिता जी रामलीला के प्रबंधक थे, इसलिए कौन सा कलाकार किस पात्र का अभिनय करेगा, यह वही तय करते थे। 

हुआ यूँ कि अशोक वाटिका और लंका दहन वाले दिन के लिए दूसरा भाई हनुमान जी बनने के लिए जोड़-तोड़ कर रहा था। उसने पिता जी को बहुत प्रयास के बाद मना लिया और एक दिन के लिए हनुमान जी का पात्र पा लिया। बड़े भाई को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा और मन मसोस कर उस दिन वह मेघनाथ जी के दल में शामिल हो गया। 

लेकिन अशोक वाटिका में उस दिन जो केले हनुमान जी को खाने थे, उनमें बस छिलके ही रखे गए थे। केले को धागे से इस तरह बाँध दिया गया था कि लगे कि फल खाया नहीं गया है। अब तक आप समझ गए होंगे कि यह काम किसने किया होगा। 

उस दिन नए हनुमान जी ने जब सीता माँ से आज्ञा लेकर अशोक वाटिका में केले खाने का प्रयास किया, तो बस छिलके ही हाथ लगे। कई प्रयासों के बाद जब एक भी केला नहीं मिला, तो नए हनुमान जी बहुत क्रोधित हुए और माइक पर आकर बोले:

“भाइयों और बहनों, इब तम आपने घराण ने जाओ, रामलीला तो हो ली आज और अब तो अड़े जूत बाजेंगे।”

इतना कहने के बाद नए हनुमान जी ने अपने भाई को पकड़ लिया और स्टेज पर ही युद्ध शुरू कर दिया। काफ़ी देर तक दर्शक हँसते रहे और फिर प्रबंधकों के बहुत प्रयास के बाद झगड़ा रुका। लेकिन तब तक दोनों में से कोई भी हनुमान जी इस स्थिति में नहीं था कि वह अभिनय कर पाता, और इस तरह लंका दहन एक दिन के विलंब से हुआ। 

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