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कौन-सा घर फिर मेरा हुआ? 

 

कितने घरों से गुज़री, 
मगर कौन-सा घर आख़िर मेरा हुआ . . . 
 
वह घर जो क्षण भर को मिला, 
जिसमें जीवन के हर पल का
फ़लसफ़ा रखा गया। 
 
वह बड़ा दरवाज़ा, 
खुला आँगन, 
चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली। 
 
वह बड़े कमरे, 
रोशनी के आने के लिए
खुली हुई जगह। 
वह सफ़ेद दीवारें, 
फिर से एक नया घर
बनाने की चाहत। 
चारों तरफ़ बिखरा हुआ सामान, 
कौन-सी चीज़ कहाँ लगेगी—
वाला शोर। 
 
हर तीन साल में
एक नया घर, 
पर कभी-कभी
थकान-सी होती है। 
जिस घर को अपनाया था, 
जिस घर को अपना कहा था। 
 
वह जो यादें
उस घर में थीं—
बहनों के साथ
खेलना-कूदना, 
पापा की डाँट, 
मम्मी का प्यार, 
कितना कुछ
सँजोया था। 
 
फिर एकदम से
वो छूट जाता है। 
 
अब जब
एक ही घर मिला है। 
 
बरसों से उसी घर को
सँजोया है। 
 
वही दरवाज़े, 
वही कुर्सियाँ, 
मेज़ भी अपनी जगह पर लगी है। 
 
बुक शेल्फ़ में किताबें
आज भी वैसी की वैसी ही हैं। 
दीवारों पर बच्चों का बचपन, 
उनके जवानी में पहुँच जाने पर भी
सँजोकर रखा है। 
 
वह घर जो चल रहा था, 
या फिर
जो चलकर भी
रुका हुआ है। 
 
वह नाम की तख़्ती, 
जो एक ही नाम के साथ
अलग-अलग रंगों में
बदल रही है। 
 
कई बार लोग पूछते हैं, 
इस तख़्ती पर
नाम बदलने को कहते हैं। 
 
वह घर
जो अपनों के ही थे, 
पर ख़ुद के नाम का
कभी नहीं हुआ। 
 
वह जो अपनी पसंद के पर्दे थे, 
वह जो पीली चादर, 
भूरे दरवाज़े। 
 
वह जो बाहर दीवार पर
नज़र पट्टू लगाया था, 
वह तुलसी का पौधा
ख़ुद अपने हाथों से बोया था। 
 
वह किचन की
अनगिनत यादें, 
वह ख़ुद का
पहला जला हुआ खाना। 
 
वह बाहर झूले पर बैठकर
अपनी कविताएँ, 
कहानियाँ लिखना। 
 
इसी हक़ीक़त में
जिया हुआ एक पल था—
उस पल का पन्ना
जैसे किसी ने
फाड़ दिया हो। 
 
नींद से उठाकर
उसे कह दिया हो—
अपनी यादों का पिटारा
यहाँ से ले जाओ। 
 
फिर से एक नया घरौंदा बनाओ, 
जहाँ तुम्हारी पसंद का
सब कुछ हो। 
 
फिर विचार आता है—
इतने सालों से
मैं क्या कर रही थी? 

क्या वह रंग
उधार के थे? 
 
क्या वह कोशिशें
बेकार थीं? 
 
क्या मेरे जैसा
कोई और आ पाएगा? 
 
मेरे जिए हुए को
थोड़ा और जी पाएगा? 
 
इस घर के सवाल के बावजूद भी, 
वो आख़िरी बार
फिर से इस घर को
उसी प्रेम से सजा पाएगा। 
 
ये रंग, ये दीवार, 
शायद कुछ समय के बाद
शायद छोटी हो जाए। 
 
इन दीवारों के बीच में
लकीरें खिंच जाएँ, 
ये तुलसी का पौधा भी
आधा-आधा हो जाए।
 
तो मेरे हिस्से में
वह कौन-सा हिस्सा आएगा—
जिया हुआ, 
या बिल्कुल ही अनजाना? 
 
शायद मेरा हिस्सा सिर्फ़ इतना ही था—
एक घर को अपना समझकर जी लेना था। 

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