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मुझे चुनो तुम . . .

 

मुझे चुनो तुम, 
अगर तुम्हें इस भीड़ में 
एक ख़ाली सा कोना रोने को मिले तो, 
अगर नींद में डूब जाने का डर सताए, 
तो मुझे चुनो तुम। 
 
अगर ये देख सकते हो कि 
तुम धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे हो, 
तो तुम चुनो मुझे। 
 
अगर तुम्हारे क़दम बार-बार रुकने से डरते हैं, 
और मंज़िलों की फ़िक्र करते हैं, 
तो तुम मुझे चुन सकते हो। 
 
मुझे चुनो तुम, 
अगर बहुत अमीर हो फिर भी 
लगते हो बेबस आईने के सामने, 
हर रोज़ निकलते हो सफ़र पर 
फिर भी न हो सके अगर सफ़र के, 
और अगर सब पाकर भी, 
डर की सूखी लू तुम्हारे खिड़कियों से गुज़रती है, 
तो फिर चुन लो मुझे। 
 
ज़ेहन में अब तक नहीं पहुँची हैं 
अगर जीवन की ध्वनियाँ, 
तो तुम मुझे चुनो। 
 
तुम चुन लो मुझे, 
अगर नहीं करते 
कोई अपनी मदद और न ही दूसरों की, 
अगर पसंद है अपनी आदतों की ग़ुलामी और 
सिर्फ़ रात और दिन से ही है तुम्हारा वास्ता, 
तो तुम मुझे चुन लो। 
 
अगर अरसा हुआ अपनी ग़लती माने हुए, 
और बारिश की चन्द बूँदें भी अब 
तुम्हें परेशान करतीं हैं, 
अगर भूल गए हो अब हार के मज़े लेना, 
तो तुम मुझे चुन लो। 
 
अगर तुम कर रहे हो छिपाने की कोशिश 
अपने रूह को, ओढ़कर हर रोज़ एक नया झूठ, 
और अब भी हो अगर अनजान ख़ुद से, 
तो क़रीब आओ और चुनो लो मुझे। 
 
अगर तुम्हें 
अपने ही घर की चाबी अब भारी लगती है, 
और अगर थक गए हो इस 'होने' और 'पाने' की ज़िद से 
तो हाथ बढ़ाओ . . . और मुझे चुन लो। 
 
मत लाओ मेरे लिए कोई फूल या इबादत, 
बस अपनी वो टूटन उठा लाओ 
जो दुनिया से छिपा रखी है, 
क़रीब आओ . . . और मुझे चुन लो। 

नितेश बनाफ़र

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