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पागल नहीं, बीमार हूँ

 

13 जनवरी 2026

कल ऑफ़िस से लौटते समय एक महिला से हुई बातचीत ने मुझे फिर से इस विषय पर सोचने को मजबूर कर दिया। उस महिला की आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थिति समाज के हिसाब से बहुत अच्छी थी। लेकिन बातचीत के दौरान साफ़ समझ में आ गया कि पिछले कुछ दिनों से उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं चल रही है। 

अब समाज क्या कहेगा? 

“पागल होगी।” 

लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। वह एक अच्छे परिवार की बेटी और बहू हैं। पढ़ाई में अव्वल रही हैं, दो बच्चों की एक परफ़ेक्ट माँ हैं। उनसे बात करके यह समझ आया कि वह डिप्रेशन से जूझ रही हैं। 

हम सभी ने अपने जीवन के किसी न किसी दौर में ख़ुद को उदास और हताश महसूस किया होगा। असफलता, संघर्ष या किसी अपने को खोने का दुख होना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन जब उदासी, निराशा और ख़ालीपन की भावना कुछ दिनों से लेकर महीनों तक लगातार बनी रहे और इंसान अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी ठीक से न जी पाए, तब यह डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में क़रीब 30 करोड़ से अधिक लोग डिप्रेशन से पीड़ित हैं। भारत में यह संख्या 5 करोड़ से ज़्यादा है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है और पुरुषों की तुलना में महिलाएँ इससे अधिक प्रभावित होती हैं। इसके कारण केवल मानसिक नहीं होते, बल्कि हार्मोनल असंतुलन, गर्भावस्था और आनुवंशिक कारण भी इसके पीछे हो सकते हैं। 

फिर भी, आज के समय में इस विषय पर बात करना समाज को मंज़ूर नहीं है। जो व्यक्ति इस बीमारी से जूझ रहा होता है, उसे सीधी भाषा में “पागल” कह दिया जाता है। और उन्हीं “पागलों” में से एक मैं भी रही हूँ। 

यह बात बहुतों को स्वीकार नहीं होगी। 

एक पढ़ी-लिखी, स्मार्ट महिला, अच्छे परिवार की बेटी, बहू और माँ। अच्छी नौकरी है, किसी चीज़ की कमी नहीं। फिर भी डिप्रेशन? 

ज़रूर पागल होगी। 

हाँ, मैं भी उन 30 करोड़ लोगों में से एक रही हूँ। मैंने क़रीब एक साल तक इस मानसिक बीमारी से लड़ाई लड़ी। भगवान की कृपा से आज उससे बाहर आ पाई हूँ। लेकिन जब अपने आसपास ऐसी महिलाओं को देखती हूँ, तो वो पूरा दौर फिर से आँखों के सामने आ जाता है। 

डिप्रेशन कोई मामूली समस्या नहीं है। यह रोज़मर्रा की परेशानियों से बिल्कुल अलग होता है। समय पर सही इलाज न मिले, तो यह बहुत ख़तरनाक रूप ले सकता है। डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति के मन में आत्महत्या जैसे नकारात्मक विचार भी आ सकते हैं। ऐसे समय में उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है प्यार, समझ और सहारे की। और सबसे ज़रूरी है—उसे ध्यान से सुनना। 

मैंने उस महिला को सुना। उनके दिल में चल रहे तूफ़ान को शांत करने की शायद एक प्रतिशत कोशिश ही कर पाई। बाक़ी की कोशिश उन्हें और उनके परिवार को मिलकर करनी होगी। 

यह बात कहने में अच्छी लगती है, लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी इस समाज में इसे “पागलपन” ही माना जाता है। यह सोच सदियों से चली आ रही है। दुख की बात तो यह है कि कई बार महिलाएँ ख़ुद भी यह मानने को तैयार नहीं होतीं कि वे मानसिक रूप से बीमार हो सकती हैं। 

डिप्रेशन कमज़ोरी नहीं है। 

यह एक बीमारी है—और इसका इलाज सम्भव है, बस समझ और संवेदना की ज़रूरत है। 

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