बूढ़े दिन
कथा साहित्य | लघुकथा अर्पिता माथुर15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
फ़ोन की घंटी बज रही थी।
कई सालों से साथ चल रहे घुटनों के असहनीय दर्द को जैसे ठुकराकर वे तेज़-तेज़ क़दमों से फ़ोन की ओर बढ़े। स्क्रीन पर नाम देखते ही चेहरे पर चमक लौट आई, “सुनो, बेटे का फ़ोन आया है!”
जैसे ही फ़ोन उठाया, उधर से सवाल आया, “क्या पापा, इतनी देर क्यों लगा दी फ़ोन उठाने में?”
एक ही सवाल से चेहरे की चमक थोड़ी मंद पड़ गई। धीरे से बोले, “वो, तेरी मम्मी को दवाई दे रहा था, इसलिए देर हो गई। भूल जाती है न अब, कौन-सी दवाई कब और कैसे लेनी है। इसलिए।”
बेटा बोला, “चलो ठीक है, मम्मी से बात कराओ।”
फिर आधे घंटे तक माँ-बेटे की बातें चलती रहीं—
“कैसी हो मम्मी? तबियत कैसी है? ख़्याल रखा करो अपना, सुबह घूमने जाया करो”
उधर पापा सोफ़े के एक कोने में बैठे टीवी की ओर देखते रहे।
टीवी चल रहा था, पर मन कहीं और था।
कई बातें थीं, कई सवाल, पर किससे कहते? सुनने वाला भी तो कोई चाहिए।
बेटे को पंद्रह साल पहले बाहर पढ़ने भेजा था, इस सोच के साथ कि मध्यमवर्गीय घर की ज़िम्मेदारियाँ, बोझ और कमियाँ उसके सपनों के रास्ते में न आएँ। वह उड़ सके, आगे बढ़ सके और एक दिन वापस आकर माँ-बाप का सहारा बने।
आज बेटा लायक़ बन गया है।
माँ-पिता कहना भी पसंद करते हैं, “आज के ज़माने में ऐसा बेटा कहाँ होता है, हमारा बेटा तो सच में श्रवण कुमार है।” हर छोटी-बड़ी बात का ख़्याल रखता है। विदेश में नाम भी कमा रहा है, पैसा भी। और उस कमाई में से कुछ मम्मी–पापा के लिए भी भेज देता है।
रोज़ फ़ोन भी करता है।
और साल में एक बार मिलने भी आ जाता है, बूढ़े माँ-बाप से।
माँ गठिया से जकड़े बदन के साथ बिस्तर पर लेटी यही सोचकर मन को समझा रही थी, “बस बच्चा ख़ुश रहे, तरक़्क़ी करे माँ-बाप को और क्या चाहिए?”
उधर पापा फिर से दवाइयों की स्ट्रिप्स उलट-पलट कर देख रहे थे, कि आज शाम कौन-सी दवाई देनी है।
कई सालों से यही दिनचर्या है . . .
बस बदलती हैं तारीख़ें।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
लघुकथा
डायरी
चिन्तन
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं