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प्रकाशमयी अंधकार

 

क्या हर वह इंसान जो मुस्कुरा रहा है, भीतर से भी प्रसन्न है? 

क्या हर चमकती आँख में उम्मीद की चमक होती है? 

और क्या हर भेदयुक्त चेहरा वास्तव में दर्द में होता है? 

समाज ने आज एक ऐसी परत ओढ़ ली है जहाँ ‘दिखना’ सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है। गहराइयों में डूबे इंसान तब तक अजनबी बने रहते हैं जब तक वे अपने घावों को दिखाना शुरू न कर दें। जैसे किसी बाज़ार में चीज़ बिकती है, वैसे ही आज भावनाएँ भी बाज़ारू हो गई हैं। 

और ऊपर से ये कहावत, “जो दिखता है, वही बिकता है।” ना चाहते हुए भी ऐसी मानसिकता को जन्म देती है जिसमें हम बिकना ही स्वीकार कर लेते हैं। 

सोशल मीडिया के दौर में इस बीमारी में कुछ लोग चपेट में आ जाते हैं और कुछ सोशल मीडिया रोग-रहित और अपनी ही ज़िन्दगी में ख़ुश या यूँ कहें कि अकेले रह जाते हैं। 

लेकिन क्या इस दिखावे के खेल में वे लोग पीछे नहीं छूट गए जो वाक़ई दर्द में हैं, पर शांत हैं? जो मुस्कान की ओट में आँसुओं को छिपाना जानते हैं? जो हर दिन उजाले के बीच एक अजीब सा अंधकार महसूस करते हैं—प्रकाशमयी अंधकार। 

यह अंधकार रोशनी में भी घिरा होता है। कमरे में लाइट जल रही होती है, मोबाइल की स्क्रीन चमक रही होती है और मोबाइल में सोशल मीडिया पर चल रहे कंटेंट और कम समय में मशहूर होने की होड़ को बड़े ही सहज तरीक़े से हम देख रहे हैं। 

लेकिन मन के किसी कोने में चुप्पी का अँधेरा अपना साम्राज्य फैला चुका होता है। अकेलापन अब भीड़ में भी पीछा नहीं छोड़ता। और सबसे बड़ा दर्द यह है कि कोई पूछता भी नहीं–“तुम ठीक हो न?” 

कभी-कभी लगता है, क्या अब दर्द की बोली भी लगनी ज़रूरी हो गई है? क्या दर्द को दिखाना, साबित करना, और बार-बार सुनाना होगा, तभी उसे मान्यता मिलेगी? जैसा सभी जगह हो रहा है। 

शायद यही कारण है कि कई लोग ख़ामोश हो जाते हैं। वे जान चुके होते हैं कि इस दुनिया को संवेदना से ज़्यादा प्रदर्शन पसंद है। इसलिए वे बस चुप रहते हैं, और ख़ुद से कहते हैं—“तू बस अपनी ख़ैर कर।”

यह केवल मेरी एक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक निवेदन है—

किसी की ख़ामोशी को नजरअंदाज़ मत कीजिए। 

हर चुप चेहरा, हर हँसी, हर जवाब—हो सकता है एक आवाज़ को दबा रहा हो। 

थोड़ा रुकिए, थोड़ा झुकिए . . . और किसी के प्रकाशमयी अंधकार को समझने की कोशिश कीजिए। 

क्योंकि हर वह व्यक्ति जो कुछ नहीं कह रहा, सबसे ज़्यादा कहने की ज़रूरत में है। 

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