प्रकृति और जीवन
काव्य साहित्य | कविता अर्पिता माथुर15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
टूटकर गिरती पत्तियों ने
परिवार का मतलब समझाया
बुज़ुर्ग जड़ों ने कैसे छोटे से बीज को अपनाया
माता-पिता रूपी तने ने
जड़ों का मज़बूती से साथ निभाया
पत्तियों ने भाई बहन-सा लाड़ लड़ाया
फूलों की सुगंध ने बग़िया को महकाया
बुज़ुर्ग जड़ की मेहनत क्या रंग लायी है?
जब परिपक्व फलों ने परवरिश को झुठलाया
प्रकृति का बदलाव
अब विरोध दिखा रहा है
बुज़ुर्ग जड़ को कमज़ोर बना रहा है
यद्यपि उस फल ने
अपनी अलग दुनिया बसा ली हो
जड़ और तने से दूरियाँ बना ली हो
लेकिन! टूटकर गिरते पत्तों ने अहसास कराया है
अपने परायों का भेद दिखाया है
जीवन को प्रकृति के साथ जोड़ कर भी देखा
संसार के नियमों को तोड़ मरोड़ कर भी देखा
अंततः एकाकी ही इस शरीर की सच्चाई है
पेड़ों से गिरते पत्तों ने
यह बात टूटकर समझायी है।
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