क़ैद की सुंदरता
काव्य साहित्य | कविता अकांक्षा पाण्डेय1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
उड़ती चिड़िया किसे भाती,
पिंजरे वाली ही सुहाती।
खुली फिरती गाय न भाए,
खूँटे से बँधी लुभाती।
ये कैसी सोच समाज की—
आज़ादी भी खटक जाती।
जो चुप रहे, जो झुककर जीए,
वही यहाँ सुंदर कहलाती।
बिटिया हो, बहू हो या पंछी,
सब पर एक ही ताला है—
क़ैद में ही क्यों ढूँढ़ते हम
सुंदरता का उजाला हैं?
सच बस इतना समझ लो—
यहाँ उड़ान नहीं, बंधन बिकता है,
जो जितना क़ाबू में रहता,
वो उतना ही अच्छा दिखता है।
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Khushi 2026/06/02 11:22 AM
बहुत हे सुंदर कविता भाव बहुत अच्छे है