क़ैद की सुंदरता
काव्य साहित्य | कविता अकांक्षा पाण्डेय1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
उड़ती चिड़िया किसे भाती,
पिंजरे वाली ही सुहाती।
खुली फिरती गाय न भाए,
खूँटे से बँधी लुभाती।
ये कैसी सोच समाज की—
आज़ादी भी खटक जाती।
जो चुप रहे, जो झुककर जीए,
वही यहाँ सुंदर कहलाती।
बिटिया हो, बहू हो या पंछी,
सब पर एक ही ताला है—
क़ैद में ही क्यों ढूँढ़ते हम
सुंदरता का उजाला हैं?
सच बस इतना समझ लो—
यहाँ उड़ान नहीं, बंधन बिकता है,
जो जितना क़ाबू में रहता,
वो उतना ही अच्छा दिखता है।
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टिप्पणियाँ
Anvi 2026/06/04 11:48 AM
आपकी कविता अच्छी लगी। ठीक इसी तरह की रचना अर्थात एक तरह की थीम पर,कुछ महीने पहले साहित्य कुंज पर प्रकाशित हुई है। 'सखी' टाइटल के साथ जिसे लिखा है अवनीश कश्यप ने। आपको जरूर उनकी कुछ कविताएं देखनी चाहिए- स्त्री,माया, अब तुम्हारी बारी है।
Namita 2026/06/04 12:35 AM
प्रिय आकांक्षा जी मैं आपकी कविता अलग अलग मंच पर निरन्तर पढ़ती हूं आपकी लेखनी बहुत अच्छी है सच कहे तो मेरे जीवन के संघर्षों में मेरे लिए सहायक रही है आपकी सोच आपके चीज़ों को देखने का तरीका बहुत अद्भुत है हमे आपकी कविता का इंतजार रहता है अनुरोध यह है आपसे की निरंतर कविताएं आपकी आती रहे बहुत बहुत धन्यवाद
Sourabh Noroji 2026/06/03 06:59 PM
Bahut sundar kavita hai . शीर्षक को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।
Khushi 2026/06/02 11:22 AM
बहुत हे सुंदर कविता भाव बहुत अच्छे है
कृपया टिप्पणी दें
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Akhilesh 2026/07/10 07:50 PM
बहुत ही अच्छा लिखती है आप आपकी सारी कविताएं हमको बहुत पसंद है और इस समय आपकी कोई नई कविता नहीं देखने को मिल रही है निवेदन है कि ढेर सारी कविताएं प्रकाशित करे कृपया अनुरोध अगर आपतक पहुंचे तो स्वीकार करे