अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सत्रहवीं अठारहवीं शताब्दी के बणजारे

 

 सतरहवीं अठारहवीं सदी के बणजारों पर रोमांचक जानकारी

 

भारतीय या यूँ कहें सम्पूर्ण मध्य पश्चिमी दक्षिणी एशिया भू भाग की मध्यकालीन व्यापार प्रणाली में बणजारों का उल्लेख किये बग़ैर इसे नहीं समझा जा सकता है। यह वह समय था जब आवागमन के साधन के तौर पर केवल ऊँट, घोड़े, खच्चर, गदहे तथा बैलगाड़ी ही थे और रास्ते विकट होते थे। साथ ही रास्तों में चोर डाकुओं का भी डर रहता था। इसी दौरान में उत्तरी पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थल और उत्तरी पंजाब की मंडियों से पेशावर, मुल्तान, ईरान, अरब, काशगर, यारकन्द, बगदाद और यहाँ तक कि रोम तक की व्यापारिक मंडियों तक व्यापारियों के क़ाफ़िले चलते थे। बगदाद और काशगर इनके प्रमुख मिलन केंद्र होते थे। ये व्यापारी बणजारे कहलाते थे और समूहों में परिवार सहित चलते थे। ये अपना सामान ऊँटों पर, गधों पर और भेड़-बकरियों पर लादे रहते थे और शिकारी कुत्ते साथ में इनके चलते थे। इनके सामान में मुख्यतः नमक, बाजरा, जड़ी बूटियाँ, शहद, कपास, ऊन आदि होता था। लौटते समय दूर की मंडियों से ये गेहूँ, चावल, कपड़ा, खजूर, सूखे मेवा, हींग, लोहा, शाल, सोना चाँदी आदि लाते थे और उन्हें स्थानीय मंडियों में छोटे व्यापारियों को बेचते थे। इन बणजारों ने अपने व्यापारिक क़ाफ़िले की यात्रा के मध्य पड़ने वाले पड़ावों पर कुएँ, बावड़ी, धर्मशाला बनवा रखी थीं जो स्थानीय आबादी के भी उपयोग में आती थीं। अभी भी शेख़ावाटी, मारवाड़ से लेकर सिंध तक बणजारों की बनवायी हुई ये सब निशानियाँ मिल जायेंगी। स्थानीय भाषा में बणजारों को बिनजार भी बोलते थे। ये अपनी भेड़ बकरियाँ फ़सल कटने के बाद ख़ाली पड़े खेतों में बैठाते थे ताकि उनकी लीद वहाँ उपजाऊ खाद बन जाये। इसके बदले में वो किसानों से अनाज इत्यादि ले लेते थे। बणजारों का क़ाफ़िला सशस्त्र होता था ताकि रास्ते में लूटमार का भय नहीं रहे। ये रास्ते में पड़ने वाले वनों में शिकार भी कर लेते थे। 

रात्रि को पड़ाव पर रुकने के बाद इन बणजारों की औरतें खाना पकाती थीं और फिर सब लोग गीत और नृत्य में मशग़ूल हो जाते थे। आज उत्तरी और पश्चिमी भारत के लोक गीत इन्हीं बणजारों संस्कृति से निकले हैं। ढोला मारू, शीरीं फरहाद, सोहनी महिवाल, लैला मजनूँँ और राजस्थानी मांढ गीत बणजारा गीत ही हैं। इनमें अरबी संगीत का भी पुट मिला हुआ है जो ये बणजारे लाये थे। इतिहास में और लोकोक्तियों में लख्खी बणजारा बहुत मशहूर हुआ जिसके पास कहते हैं एक लाख ऊँटों का कारवां था जो यूनान, तुर्की तक और बलूचिस्तान, काबुल के साथ साथ बस्तर, दक्खन तक जाते आते थे। इसी लख्खी बणजारे पर मारवाड़, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़ और पंजाब में बहुत से लोकगीत गाये जाते हैं। इन बणजारों के क़ाफ़िलों को अपने ठिकाने पर लौटने में साल साल लग जाते थे। जन्म, विवाह, मौत आदि मानवीय क्रियायें यात्रा के दौरान ही हो जाती थीं। शेख़ चिल्ली की कहानियाँ, शेख़ सादी की कहानियाँ, अली बाबा चालीस चोर, बगदाद का चोर, लैला मजनूँँ, ढ़ोला मारू आदि चरित्र इन बणजारों के रात्रि कैम्पों की क़िस्सा परंपरा से ही पैदा हुए हैं। 

पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेशमा बणजारन बीकानेर के बणजारा क़ाफ़िले में ही पैदा हुई थीं। यूरोप की हिप्पी संस्कृति भारतीय बणजारों से ही प्रेरित थी। 

बणजारों का एक और प्रसिद्ध रूट ट्रांस हिमालय रूट था जो सिल्क रूट कहलाता था जो मंगोलिया, चीन, तिब्बत, कश्मीर होते हुए अरबिस्तान को पार करके भूमध्यसागर तक जाता था। इस पर अधिकतर मंगोल चीनी बणजारे चला करते थे। इनका सामान खच्चर, भेड़ और याक पर लदा रहता था। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

मधु शर्मा 2025/11/19 01:05 AM

लेखक महोदय के अन्य दोनों ऐतिहासिक आलेखों ('प्राचीन हिमालयी तीर्थ यात्रा' व 'प्राचीन काल में होने वाली भारत कैलाश यात्रा') की भाँति यह आलेख भी संक्षिप्त होते हुए भी बहुत ही रोचक है। बणजारा शब्द संभवतः वाणिज्य से ही उपजा होगा। आलेख पढ़ते हुए स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि लेखक द्वारा विस्तृत अध्ययन किया गया है। कृपया अरविंद जी, यदि आप यहाँ उल्लेख किए हुए इन दो-तीन प्राचीन मार्गों का मानचित्र/नक़्शा भी सम्मिलित कर दें तो सोने पर सुहागा हो जाये।

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ऐतिहासिक

सांस्कृतिक आलेख

नज़्म

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं