अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सीख टोपी की

 

बेटा, सुन लो आज पिता का
अनमोल अनुभव, पक्का तजुर्बा, 
इस दुनिया में सीधे चलना
अक्सर बन जाता है सबसे बड़ा गुनाह। 
 
सीधे-सादे लोग यहाँ
भीड़ में सबसे पहले कटते हैं, 
जो टोपी पहनाना जान लें
वही आगे सबसे तेज़ बढ़ते हैं। 
 
मुस्कान ओढ़ो, वचन मधुर रखो, 
मन में कुछ और, मुख पर कुछ और, 
सच की गठरी घर में छोड़ो, 
बाज़ार में बिकता है बस चालाकी का शोर। 
 
हर वादा लिखो पानी पर, 
हर रिश्ता तोलो लाभ-हानि में, 
जो भोला बनकर बैठा है
उसे बिठाओ अपनी कहानी में। 
 
जब कोई पूछे—“सच क्या है?” 
तो सच को थोड़ा मोड़ देना, 
टोपी उसकी आँखों पर रखकर
ख़ुद को आगे जोड़ देना। 
 
नेता बनो, व्यापारी बनो, 
या बन जाओ ज्ञानी कोई, 
जो टोपी पहनाना सीख गया
वही कहलाया सबसे होशियार सोई। 
 
पर सुन बेटा, एक बात कहूँ
जो अनुभव की अंतिम सीख है
हर टोपी जो तुम पहनाओगे
कभी न कभी ख़ुद के सिर पर भी ठीक है। 
 
क्योंकि इस दुनिया के मेले में
हिसाब बहुत पुराना है, 
जो आज पहनाता है टोपी
कल उसी का सिर निशाना है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँगूठे की व्यथा
|

  पहाड़ करे पहाड़ी से सतत मधुर प्रेमालाप, …

अचार पे विचार
|

  पन्नों को रँगते-रँगते आया एक विचार, …

अतिथि
|

महीने की थी अन्तिम तिथि,  घर में आए…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य कविता

कविता - हाइकु

सामाजिक आलेख

कविता

लघुकथा

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं