तरंगांतरंग . . .
काव्य साहित्य | कविता साई नलिनी1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
तरंगांतरंग . . .
भँवर से जूझकर नहीं भागना चाहती हैं लहरें,
ठोकर खाकर भी अपने उद्गम वापस आती हैं।
हताश हैं ज़रूर, पर छोड़ी नहीं है अपनी ज़िद,
किनारे के उस पार कुछ तो छुपाकर रखी है!
सदियों का सफ़र है, ये थककर भी थमती नहीं,
मिट जाती हैं मिट्टी में, मगर हिम्मत हारती नहीं।
अनेक बार बिखरकर फिर से सिमट आती हैं,
शायद तट से कोई मौन वादा निभाते आ रही हैं!
थाम नहीं सकता कोई तरंग के उठते संकल्प को,
दरिया के दामन में सँजो रखा है अपने अश्कों को।
कुछ तो अनमोल बंधन है इनका साहिल के साथ,
देखो! कैसे चूम रही हैं हर बार घायल किनारे को!
समंदर के दिल से उठके साहिल तक दौड़ आती हैं,
तट की रेत पे अपने ही पैरों के निशाँ छोड़ जाती हैं।
मिटना और बनना ही जीवन का लक्ष्य बन गया है,
लहरें छुपाती नहीं, अपनी मुक्त फ़ितरत दिखाती हैं।
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