वेलकम टू लाइफ़
कथा साहित्य | कहानी महेन्द्र तिवारी1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
सुबह के ठीक दस बजे थे। महल्ले की गली में सब्ज़ीवाले की चिर-परिचित आवाज़ गूँज रही थी।
“टमाटर ले लो, बैंगन ले लो, आलू ले लो!”
आवाज़ रोज़ आती थी, पर आज सुनीता को ऐसा लग रहा था, जैसे कोई बेवजह गला फाड़ रहा हो। वह रसोई के स्टैंड पर पड़े ठंडे, बासी पराँठे को देख रही थी, जिसे उसने कल शाम को बनाया था और जिसे खाने की अब हिम्मत नहीं हो रही थी। उसकी नज़र आलमारी के ऊपर रखे एक पुराने, धूल भरे पैकेट पर टिक गयी। उसमें एक मोटी, मज़बूत रस्सी सलीक़े से रखी हुई थी, जैसे कोई क़ीमती तोहफ़ा हो। उसकी आँखों में कोई दुःख, कोई आँसू या पछतावा नहीं था, बस एक अजीब-सी ठहरी हुई शून्यता थी। वह खड़ी रही और दीवार पर टँगी अपनी शादी की पुरानी तस्वीर को देखा जिसमें उसके पूर्व पति मुस्कुराते हुए खड़े थे। उस चेहरे ने आज उसके जीवन को एक कड़वा मज़ाक़ बनाकर रख दिया था। और अब उसे तीन-चार महीने से कोई नौकरी नहीं मिल रही थी। ज़िन्दगी बोझ बन गयी थी।
तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी। ट्रिन-ट्रिन! सुनीता सोचने लगी, “अभी इस वक़्त कौन हो सकता है?”
दरवाज़ा खोला तो सामने एक हृष्ट-पुष्ट डिलीवरी बॉय खड़ा था। उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं, फिर भी उसके चेहरे पर एक गर्वित मुस्कान थी। उसे याद आया कि उसने ब्रेकफ़ास्ट भी ऑर्डर किया था।
वह लड़के ने उत्साहित होकर अपना हाथ आगे बढ़ाया, “मैम, आपका ऑर्डर।”
सुनीता ने बिना कोई सवाल किए पैकेट ले लिया। वह दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी कि वह लड़का बोला, “मैम, एक सेकंड! आज थोड़ी गर्मी है, और मैं सुबह से दस डिलीवरी कर चुका हूँ। क्या एक गिलास पानी मिल सकता है?”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं, रुकिए।”
सुनीता अंदर गई। गिलास लेने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, उसकी नज़र फिर उसी रस्सी पर पड़ी। रस्सी और पैकेट, दोनों ने उसे एक पल में जकड़ लिया। उसका दिल ज़ोर से धड़का, इतना ज़ोर से कि लगा जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। वह कुछ पलों के लिए वह वहीं जड़वत् खड़ी रह गई मानो सारी दुनिया थम गई हो, बस धड़कन ही चल रही थी। उसने बिना ध्यान दिए गिलास में पानी भरा और किसी रोबोट की तरह दरवाज़े पर लौट आई।
डिलीवरी बॉय ने पानी का गिलास लेने के लिए भीतर झाँका। उसकी नज़र उस मोटी रस्सी पर जा टिकी। उसकी वह भरोसेमंद मुस्कान अचानक ग़ायब हो गई।
उसने धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, “मैम . . . सब . . . सब ठीक-ठाक तो है न? ये चीज़ . . . मुझे अच्छी नहीं लगी।”
सुनीता ने चौंकते हुए, लगभग झूठ बोलते हुए कहा, “हाँ, हाँ, सब ठीक है! ये तो बस . . . ऐसे ही यहाँ पड़ी रह गयी है।”
“आपके चेहरे से नहीं लग रहा। मैम, सच कह रहा हूँ। मैं एक अजनबी हूँ, पर कभी-कभी अजनबी से बात करना आसान होता है। क्या आप मुझे अपनी परेशानी शेयर कर सकती हैं?”
यह बात उसके दिल को छू गई। महीनों बाद, किसी ने उसकी टूटी हुई हिम्मत की चिंता की थी। महीनों बाद, किसी ने उसके चेहरे पर इंसानियत का लेबल पढ़ा था। उसकी आँखों से आँसुओं की एक गर्म धार निकल पड़ी।
“मैंने प्रेम विवाह किया था . . . घरवालों के खिलाफ़। एक साल भी नहीं बीता, वो मुझे छोड़ कर चला गया। आज चार महीने से अकेली हूँ। न नौकरी, न पैसे . . . और ना ही कोई सहारा नहीं . . . बस यह ख़ाली कमरा है,” उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा।
डिलीवरी बॉय ने पानी का गिलास मेज़ पर रखा। उसने धीरे से कहा, “आपके माँ-बाप हैं?”
“हैं, पर मैंने ख़ुद ही सारे रिश्ते तोड़ दिए थे। ज़िद में आकर।”
“मैम, ज़िद तोड़ना आसान होता है, ज़िंदगी नहीं। उन्हें फ़ोन कर लीजिए। ऐसी कोई ग़लती नहीं होती, जिससे रिश्ते मर जाएँ, जब तक लोग ज़िंदा हैं।”
सुनीता का दिल जैसे टूट कर पिघल गया। यह सलाह नहीं थी, यह एक आख़िरी पुकार थी। उसने हिचकते हुए, काँपते हाथों से फ़ोन उठाया।
“हैलो . . . पापा . . .” कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद, एक भारी, प्यार से भरी, फटी हुई आवाज़ आई, “सुनीता, तू ठीक है न? आवाज़ क्यों टूट रही है?”
वो फूट पड़ी, “पापा, माफ़ कर दीजिए . . . बहुत बड़ी ग़लती हो गई।”
“बेटा, ग़लती सब करते हैं, पर तू अकेली नहीं है। तू अभी घर आ जा। तेरा घर आज भी तेरा इंतज़ार कर रहा है और मैं हूँ तेरे लिए।”
फ़ोन कट गया, पर उस आवाज़ ने जैसे सालों पुरानी दीवार तोड़ दी। सुनीता ज़मीन पर बैठकर सिसक-सिसक कर रोने लगी। वह रोना जो महीनों से गले में फँसा था, आज बाहर निकल रहा था।
डिलीवरी बॉय चुपचाप खड़ा रहा। जब सिसकियाँ थमीं, तो उसने एक गहरी साँस ली और बोला, “आपको पता है, मैं असल में डिलीवरी बॉय नहीं हूँ। मेरा नाम दीपक है। मैंने हाल ही में एक वुमन एम्पावरमेंट स्टार्ट-अप शुरू किया है, जो घर बैठी महिलाओं को आसान काम देता है। आज हमारा डिलीवरी बॉय बीमार था, तो मैं ख़ुद ही आ गया . . . और शायद यह सही दिन था।”
सुनीता ने आँसू पोंछते हुए उसकी तरफ़ देखा। उम्मीद की एक छोटी-सी किरण उसकी आँखों में चमक उठी, “क्या . . . क्या आपकी कंपनी में मेरे लिए कोई काम मिल जायेगा?”
“हाँ, ऑफ़िस असिस्टेंट का है। सैलरी अच्छी है। आप चाहें तो कल 10 बजे से जॉइन कर सकती हैं।”
वह उसे कुछ पल देखती रही। उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि ज़िंदगी इतनी जल्दी, एक डिलीवरी बॉय की घंटी से पलट भी सकती है। उसने धीरे से कहा, “थैंक्यू, दीपक . . . अगर आप न होते तो मैं आज . . .”
दीपक ने मुस्कुराते हुए मेज़ से पानी का गिलास उठाया और उसे थमाया, “पानी पी लीजिए, मैम। इसकी ज़्यादा ज़रूरत आपको है।”
वह चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ, पर इस बार कमरे की ख़ामोशी वैसी नहीं थी। दीवारें भी जैसे साँस लेने लगीं थीं।
सुनीता ने वह रस्सी उठाई, उसे एक पल देखा, फिर मुस्कुराकर उसे डस्टबिन में फेंक दिया। वह रस्सी नहीं थी, वह उसका पुराना डर था।
अगली सुबह जब सूरज की पहली सुनहरी किरण ने उसके कमरे में दस्तक दी, तो सुनीता की आँखों में वह बोझ नहीं था जो सालों से उसकी पलकों पर टिका रहता था। उसने रसोई के एक उपेक्षित कोने से चाय का वह डिब्बा निकाला, जिस पर महीनों से वक़्त की धूल जमी थी।
आज जब चाय की ख़ुश्बू कमरे में फैली, तो उसे एहसास हुआ कि ज़िंदगी का स्वाद चीनी में नहीं, बल्कि ख़ुद के लिए जिए गए चंद पलों में होता है।
तभी मेज़ पर रखे फोन की स्क्रीन चमक उठी। दीपक का मैसेज था, “मैम, आज ठीक 10 बजे ऑफ़िस आ जाइए। आपके नाम का आईडी कार्ड टेबल पर रखा है। वेलकम टू लाइफ़!”
सुनीता ने चाय की पहली चुस्की ली और खिड़की से बाहर चमकते आकाश को देखते हुए बुदबुदाई, “कल मैं किसी ‘ऑर्डर’ की डिलीवरी करने नहीं, बल्कि ख़ुद की पहचान से हाथ मिलाने जा रही हूँ।”
दीवार पर पसरती धूप की लकीर जैसे गवाही दे रही थी कि दरवाज़े पर बजने वाली हर घंटी महज़ कोई पार्सल या ज़िम्मेदारी लेकर नहीं आती; कभी-कभी वो दबी हुई उम्मीदों और ठहर चुकी ज़िंदगी की वापसी का पैग़ाम भी लाती है।
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