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अमरनाथ यात्रा

पिछले दो दिनों से वह ज़िला सदर अस्पताल के चक्कर लगा रहा था, लेकिन उसे निराशा हाथ लग रही थी। उसे "अमरनाथ यात्रा" के लिए एक मेडिकल फ़ॉर्म पर सिविल सर्जन से हस्ताक्षर करवाने थे। इस कार्य के लिए आज वह तीसरे दिन फिर सिविल सर्जन कार्यालय का दौरा कर रहा था। पिछले दोनों दिन उसे सिविल सर्जन महोदय के बैठक, संचिकाओं का निबटारा तो कभी, "बोर्ड ऑफ़ डॉक्टर्स" में से किसी एक डॉक्टर के अनुपस्थिति का हवाला देकर वापस लौटा दिया जा रहा था। इनके साथ-साथ कुछ प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने वाले वैसे छात्र को भी निराशा हाथ लग रही थी, जिनको मेडिकल प्रमाणपत्र की ज़रूरत थी। 

आज तीसरे दिन वह संकल्पित होकर अस्पताल गया था, चाहे जो हो काम करवाकर की दम लूँगा। गंतव्य पर पहुँचते ही फिर उत्साह फीका पड़ गया, जैसे ही पता चला की आज सिविल सर्जन विलम्ब से आएँगे। अपनी समस्या बताने पर एक व्यक्ति ने अपनी ऊँगली से इशारा कर एक जगह के बारे में बताया की फ़लाने आदमी से मिल लें, काम हो जायगा। 

इस निठल्ली सरकारी तंत्र और प्रशासनिक अराजकता में आकंठ डूबे सरकारी (सदर) अस्पताल में त्वरित कार्य होने की उम्मीद लिए उसने वहाँ जाना ही उचित समझा। हालाँकि! वह इस बात को भली-भाँति जान गया था की वहाँ दलाल टाइप लोग हैं। वहाँ पहुँचकर दलाल से सौदेबाज़ू होने के बाद, वह "अमरनाथयात्रा" के लिए सरकार द्वारा निर्धारित मेडिकल फ़ॉर्म और दो सौ रुपया उस दलाल को सौंपकर, एक आश्वस्त भाव से घर वापस जाने लगा, तब दलाल ने कहा, "भाई साहेब आज साढ़े चार बजे आ जाइएगा आपका काम हो जायेगा"। बाबा "अमरनाथ" का मन से जयकार करते हुए उसने घर की ओर प्रस्थान कर दिया, उसकी वर्षो की अमरनाथ यात्रा की तमन्ना जो पूरी होने जा रही थी।

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