अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अम्मा! दादू बूढ़ा है

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा, करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे फेंक दें, तपती धूप में सेंक दें!

तुम ही तो कहती हो ये खाँसता है,
चलते चलते हाँफता है,
कितना भी खिलाओ अच्छा इसको,
फिर भी हमेशा माँगता है…
न कहीं जाता है, न कुछ करता है,
खटिया पर पड़े पड़े सड़ता है,
अंधा है, बहरा है, चाल तो देखो लंगड़ा है,
ज़ोर नहीं रत्ती भर फिर भी कितना लड़ता है।

इसे देख बापू झल्लाते हैं,
सामने ही दाँत किटकिटाते हैं,
कहते हैं मर क्यों नहीं जाता,
कब से ज़िंदा है, जग से तर क्यों नहीं जाता।
अब क्या बचा है जिसके लिए ज़िंदा है,
इसकी वजह से जीवन शर्मिंदा है,
कहते हैं, जायदाद में कुछ नहीं इसके पास,
जो है, उसपे इसका शिकंजा है।

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे जला दें, या फिर ज़हर पिला दें!

अम्मा! एक बात कहूँ, मारोगी तो नहीं!
दादू जैसा बंद कमरे में डालोगी तो नहीं!

अम्मा! दादू अच्छा है,
मेरी तरह बच्चा है,
अम्मा! दादू रोता है,
हम सबके बावजूद अकेला होता है,
जानती हो, वह सुनता भी है,
मन ही मन कुछ बुनता भी है।
बापू के तानों पर सहम जाता है,
रूखा सूखा जो दिया सब खाता है,
वह चल नहीं पाता फिर भी गाँव जाता है,
सोना हो या सूखे बेर, हमारे लिए ही लाता है।

दादू अब भी बापू को चाहता है,
तुम्हें बेटी उन्हें बेटा मानता है,
भले तुम उसे बुरा कहो, गाली दो,
बापू परिवार जानता है, दुआ जानता है।

अम्मा! कुछ दिन बाद दादू मर जाएगा,
तो मुझे कहानी कौन सुनाएगा?
चोट लगेगी तो कौन चुप कराएगा?
तम्बाखू के चार पैसे मेरे लिए धोती में कौन छुपाएगा,
मेरी शरारत पर कौन हँसेगा?
तू मेरे जैसा है, मुझे कौन बताएगा?
मुझे खिलौना नहीं चाहिए, मिठाई नहीं चाहिए,
मुझे दादू चाहिए, मैं दादू कहाँ से लाऊँगा?

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
बेकार सही लाचार सही,
हम बिन वह अधूरा है,
क्यों न उसे प्यार दें! अपने पाप उतार दें!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं