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अतीत की याद

कल की पुरवाई सी कब हवा चली?
झलते झलते मन के तार,
उनकी यादों को उकेर कहाँ चली?
जब बादल इस गगन में आ छा जाते।
उनके कड़क सी कड़वे गर्जन में।
काँप उठते नभ-धरा के पोर पोर!

 

तब गर्जन मे एकान्त सी बैठ।
ना जाने कितने चित्र उभरते हैं?
मन के इस नीरव क्लान्त कोने में।
क्यों खोकर अपनत्व इस भुवन का,

 

मैं अब ढूँढ़ती रजनी का मधुर हास।
छलक कर उठ पड़ी पीड़ा थी जो मन की।
हाँ यह उसी दर्द की आहत आहट है।
जो अब भी ओस बनकर पत्तों पर ढलती है।
उँगलियों से गिनती बिछड़न के पल।
चुपचाप  जला करती है।

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