अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

भूखा हूँ माँ!

माँ अपने रक्तकणों से सिंचित कर
अपने चेहरे को मुझमें प्रतिबिम्बित कर
क्यांे मुझे तुमने युवा किया?
पुनः मुझे अवस्था बाला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।1।

 

न जाने उम्र के इस दहलीज़ पर
क्यों रख दी तुम मुझे लीज पर?
नहीं चाहिए था तुम्हे ऐसा करना,
अपने स्नेह का शिवाला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।2।

 

बचपन में भूखने पर भोजन देती
ज़िद पर अड़ने पर चाँद ना देती,
अब क्यों मुझे दे दी वैसी पूर्ण चाँद?
मुझे जीवन पुनः बचपन वाला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।3।

 

युवा होने पर तूने क्यों दूर किया?
मुझे परवश होने को क्यों मजबूर किया?
क्या तुमने किया है मेरे साथ न्याय?
ठंड लग रही है आँचल का पाला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।4।

 

तुम्हारा मस्तक उँचा करने को करता हूँ हर कर्म
प्रतिकर्मों में स्मरण कर निभाता शैशवधर्म,
बचपन में तुम देती थी जो आशीष, वही
कुलदीपक बनने की, आशीषप्याला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।5।

 

कुछ नया करने को सोचता प्रतिपल
तुम्हे महसूस करके जीता पल दो पल,
अपने विचार वितर्कों से रोज़ जीता - मरता हूँ,
मातः! स्वहृदय की रजनीबाला दे दो ना!।
भूखा हूँ माँ निवाला दे दो ना!।6।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

शोध निबन्ध

सामाजिक आलेख

कविता

साहित्यिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं