अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

एक विचारणीय प्रश्न : गाड़िया लोहार

दूर से उड़ता दिखा, 
इक रेत का छोटा बवंडर,
आ रही इक बैलगाड़ी, 
मंद गति से चरमराकर।
हाँकता कृषकाय सा नर, 
गीत गाता गुन-गुनाकर,
बैल ग्रीवा की वो घण्टी, 
देती समर्थन झुन-झुनाकर।

 

सामने विस्तृत मरुस्थल पड़ा अपार है,
वो गाड़िया लोहार है, वो गाड़िया लोहार है॥

 

एक विशाल वट-वृक्ष के 
नीचे डेरा डालकर,
हो रहा न तनिक विचलित, 
मुश्किलों को पालकर।
जी रहा इस ज़िंदगी को, 
संस्कृति निज मानकर,
हो रहें हैं  नत मनुज 
इतिहास उसका जानकर।

 

सह रहा है जो ये सब, वो प्रताप का अवतार है,
वो गाड़िया लोहार है, वो गाड़िया लोहार है॥

 

दे रहा आश्रय वो अंबर, 
नीली छत्र-छाया तानकर,
लेता परीक्षा कड़ी भास्कर, 
भट्ठी-सी धरती को तपाकर।
करुण क्रंदन कर रहे शिशु, 
भूख से दो बिल-बिलाकर,
ले रही निःश्वास माता, 
भूखे ही बालक को सुलाकर।

 

झेलता जाता है सब, न कर रहा गुहार है,
वो गाड़िया लोहार है, वो गाड़िया लोहार है॥

 

संदर्भः- उपर्युक्त कविता के माध्यम से मेवाड़ (राजस्थान) मुग़ल युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाली एक जनजाति की वर्तमान दुःखद स्थिति का चित्रण किया गया है, जिसके बलिदान को इतिहास के महज़ कुछ पन्नों में समेट कर समाज ने उनके प्रति अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली है। हमारा यह कर्त्तव्य है कि हम उन्हें वह सम्मान दिलाएँ जिसके वो हक़दार हैं।      

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं