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गंगा में चाँद

एक मदारी 
ज़ोर-ज़ोर से
डुगडुगी बजाकर – बजाकर
कह रहा है...
भाइयो और बहनो!
बजबजाती दुर्गंधयुक्त 
इस गंगा  में
चाँद  तैरेगा...


पीछे पंक्ति में खड़े लोग
दुम हिलाते हुए
आसमान की तरफ़
देखकर
हुआ-हुआ करते हैं।


भिड़ जुटती जा रही 
और, मैं
अपना मुँह ज़मीन पर ,
रगड़-रगड़ कर 
लहुलुहान
कर रहा हूँ।

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