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ख़ुशी या ग़लती

पूरी कॉलोनी में सिर्फ यही चर्चा थी की वर्षा के रंग-ढंग अच्छे नहीं है, पता नहीं हर दिन दोपहर जिम जाती है या क्या करती है, घंटों फ़ोन पर बात करती रहती है किसी से। पैसे कमाने वाला पति, घर में सास-ससुर, स्कूल जाते बच्चे, सारी ख़ुशियाँ हैं वर्षा के पास फिर भी ऐसी हरकतें? ये कहते हुए मंजू मौसी उठी और बोली कि जब भी वर्षा दिखेगी मैं उससे पूछूँगी कि आख़िर क्यों बदनामी वाले काम कर रही है? उसी दिन राजेश ने भी सोच लिया था की आज वर्षा से साफ़-साफ़ पूछ ही लूँगा कि कौन है वो?

आख़िर एक दिन मंजू मौसी ने पार्क में वर्षा को फ़ोन पर बात करते पकड़ ही लिया और बोली, "ये क्या तुमने पूरी कॉलोनी का माहौल गन्दा कर रखा है। अच्छे घर की औरतों को शोभा देती हैं क्या ऐसी हरकतें? कौन सी ख़ुशी नहीं है तुम्हारे पास?"

वर्षा ने बड़े दुखी मन से कहा, "आइये बेंच पर बैठते हैं।" वो बोली, "मौसी एक जवान औरत को अपने पति से क्या ख़ुशी चाहिए होती है जिसकी वज़ह से उनका रिश्ता बना रहे। वो है प्यार और एक दूसरे के साथ बिताने केलिए थोड़ा सा समय जिसमें कोई काम की बात न हो। अगर मुझे वो ख़ुशी घर में न मिले और दिन भर बस बिस्तर पकड़ी हुई सास की सेवा, बच्चों को स्कूल और क्लॉसेस लाना ले जाना, खाना पकाना और इस आस में हर शाम और रात गुज़ार देना कि शायद आज राजेश के पास मेरे लिए बच्चों और सास-ससुर के बाद समय हो। कब तक इंतज़ार करूँ मैं? अगर किसी और इंसान– चाहे वो कोई सहेली, दोस्त या कोई और हो, के साथ, कुछ पल बीता के दिन के सारे पलों में मैं ख़ुश हूँ और सबको ख़ुश भी रख पा रही हूँ तो इसमें ग़लत क्या है? ख़ुश भी वैसे रहूँ जैसे समाज चाहता है?" 

और फूट-फूट कर रोने लगी। राजेश पीछे खड़ा सब सुन रहा था लेकिन दोनों औरतों को पता न चला। ना मौसी कुछ बोली ना राजेश। राजेश ने मन ही मन वर्षा से माफ़ी माँगी, अपने आँसुओं को पोंछा और चुपचाप घर की ओर चल पड़ा। आज उसने तय कर लिया कि वर्षा को घर के बाहर ख़ुशियाँ ढूँढ़ने के लिए मजबूर नहीं करूँगा।

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