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क्षितिज : आस्तिक मन की सहज अभिव्यक्ति 

समीक्ष्य पुस्तक: क्षितिज (काव्य संग्रह)
लेखक: डॉ. प्रेमलाल गौतम
प्रकाशक: छोटा पुस्तकालय प्रकाशन समलोह, अर्की ज़िला सोलन-१७११०२
संस्करण: 2013

‘शिखरों से’ उन्नत रहने की,
शीत व आतप सहने की। 
झंझावत चले जीवन में,
मन के दीप’ जला रखने की॥ 
स्व से पर तक भाव का प्रेषण,
यही ‘विवक्षा’ है इस जन की। 
त्रिवेणी भावों की पोषक,
उद्धारक है भावुक मन की॥ 
‘क्षितिज’ चूमने की हर लिप्सा,
आतुरता है इस कवि मन की। 
शब्द-ब्रह्म का परम उपासक,
अर्पित भाव है इस गौतम की॥   

शब्द ब्रह्म की उपासना में समर्पित हिमाचल प्रदेश के यशस्वी कवि डॉ. प्रेमलाल गौतम का चतुर्थ काव्य-संग्रह पढ़ने का सुअवसर मिला। पूर्व-प्रकाशित ‘शिखरों से’, ‘मन के दीप’, ‘विवक्षा’ की धूमिल सी स्मृति के बीच जब ‘क्षितिज’ काव्य संग्रह हाथ में आया तो यकायक गौतम जी के व्यक्तित्व की आभा और गरिमा उनके कृतित्व के माध्यम से सजीव हो उठी। ऊपर उद्धृत ‘क्षितिज’ संग्रह की कविता में कवि गौतम ने अपने काव्य-दृष्टि  और जीवन-दर्शन को भी समेट दिया है।  डॉ. केशवानंद ममगाई ने उन्हें हिमाचल की माटी का कवि कहा है तो सुशील कुमार फुल्ल ने उन्हें भारतीय रीति-नीति एवम् संस्कृति से संपृक्त कवि माना है। ‘क्षितिज’ कविता-संग्रह में प्रकाशित कविताओं के साक्ष्य से कहा जा सकता है कि गौतम जी की कविताओं में उनके आस्तिक मन को सहज अभिव्यक्ति मिली है। उनकी कविताओं में एक संवेदनशील, कर्तव्यपरायण, प्रेरणाप्रद आदर्श शिक्षक आत्माभिव्यक्ति पाता है। ‘कविता-कानन बहलाता है’ नामक कविता में उनकी काव्य-भूमि और सृजन प्रेरणा की सहज अभिव्यक्ति हुई है–

दुर्दिन का दामन सम्भाले,
घटाटोप घन छलकाता है। 
जब तक उलझा संघर्षों में, 
छंद-बन्ध ही सहलाता है॥   
व्यंग्य-बाणों से छलनी मन,
विदीर्ण हुआ जब पछताता है 
मंद-सुगंध-समीर लिए 
यह कविता-कानन बहलाता है॥   

इस संग्रह की कविताओं को तीन-चार कोणों से देखा जा सकता है। अधिकतर कविताएँ स्वप्रेरणा, निजी अनुभवों और शिक्षक-सुलभ मार्गदर्शन की सहज अभिव्यक्ति हैं। कवि मन, मन के उद्गार, जल-जल दीप, क्षितिज, भूल जा छोटा बड़ा, प्रकाश–पर्व पर आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। ‘कवि-मन’ कविता में कवि ने अपनी जीवन दृष्टि को सम्यक अभिव्यक्ति दी है। अन्यत्र भी अनेकशः उनकी इसी जीवन दृष्टि को अभ्व्यक्ति मिली है। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये कविताएँ एक ही भाव सूत्र से बंधी हैं और ये इस बात का भी परिचायक हैं की कवि एक स्थिर सुदृढ़ धरातल पर खड़े हो कर जीवन को उसकी समग्रता में अविचल भाव से देख रहा है। ‘यथार्थ की कुछ बात कर’ कविता में यही स्थैर्य-संतुलन द्रष्टव्य है। ‘प्रकाश-पर्व पर’ कविता में वेदों, उपनिषदों, और संतों की वाणी की प्रेरणा से कवि मानो सामान्य मानवी का सजग हो कर दिग्दर्शन करता है। सम्प्रति–

पर हिस्से की चाह को त्यागो,
निबिड़-निशा में सजग हो जागो। 
माया ठगिनी दाव लगाए  
पांच चोर बैठे यहाँ भागो॥  

और 

जन्म दिवस का लक्ष्य एक हो 
परहित कुछ करने का भाव। 
स्व का तिल–तिल अर्पित कर के 
हो सब का हृदय विद्राव॥

दूसरे वर्ग में वे कविताएँ आती हैं जो निजी मित्रों, सगे सम्बन्धियों और प्रेरणा-पुरुषों को संबोधित हैं। वास्तव में कवि का सहज-उदार, निश्छल मन किसी से भी प्रेरणा प्राप्त कर लेता है और प्रेरणा प्राप्त कर स्वयं ही कृतज्ञ भाव से भर जाता है और तब उनका कवि मन ऐसे व्यक्तियों के प्रशस्ति गायन से स्वयं को रोक नहीं पाता है। एस. सी. गौड़, डॉ. वासिष्ट, चंद्रमणि वशिष्ठ, डॉ. सोहन लाल, डॉ. यशवंत परमार के अतिरिक्त उनके अपने सगे सम्बन्धियों में माँ, भ्राता और स्व-पत्नी भी उनकी कविता का सहज विषय बन जाते हैं। इसी भाव की ‘बापू के प्रति’ कविता में तो वे वर्तमान के राजनीतिक अनाचार, भ्रष्टाचार और सामान्य मानवी के जीवन में आई चतुर्दिक गिरावट को देख दुखी मन से बापू के पुनः अवतार की कामना करते हैं। ऐसी कविताओं में भी  कवि की सदिच्छा, संवेदना, जीवन-दृष्टि और जीवन के मर्म की सहज अभियक्ति हुई है। ‘सब कुछ वार’ दिया कविता में कवि अपनी जीवन संगिनी को सहृदय आभार व्यक्त कर रहे हैं। ऐसा कृतज्ञ भाव दुर्लभ है। 

चंबा-सुषमा, वसंत पंचमी तुम्हें प्रणाम, प्यारा हिमाचल, मेरा सिरमौर, केदारनाथ आदि तीसरे वर्ग की कविताएँ प्रकृति-चित्रण की अपेक्षा प्रकृति दर्शन की कविताएँ हैं। 

श्रमिक के प्रति, भाग्य और पुरुषार्थ, राष्ट्र-भाषा, राष्ट्रपिता की मांग, अस्मिता गाँव की, बोधिसत्व: आज, दीपक जलते हैं, श्वान आदि विविध कविताएँ कवि-संवेदना की व्यापकता की परिचायक हैं। इन कविताओं में अन्त्यानुप्रास और गीति-शैली को त्याग कवि ने नवीन शैली को अपनाया है। किन्तु गौतम कवि के हृदय का तरल सामान्यता लयबद्ध होकर ही शब्द-रूप धारण करता है। पनिहारिन, गीत, प्रेरणा-गीत, कविता-कानन बहलाता है, बीत गया आदि कविताएँ सहज गीति के सुन्दर उदाहरण हैं। आस्तिकता की मसृण धरा पर खड़ा कवि ‘प्रेरणा-गीत’ में सहज-भाव से कह उठता है–

दुर्दिनों के सघन ये अँधेरे,
चाँद-सूरज को कब तक ढकेंगे। 
व्यर्थ स्पर्धा लिए है यह जुगनू,
ध्रुव के आगे ये कब तक रुकेंगे॥ 
उसकी शक्ति ही शाश्वत है बन्धु। 
उसका छिनपल हमें है सहारा॥ 
कर चलें कोई काम ऐसा बन्धु ! नाम जग में जो रहे तुम्हारा। 
किस गति से बहा जल नदी का, साक्षी होता रहा है किनारा॥ 

मन-उद्गार, प्रकाश-पर्व पर आदि कविताएँ वास्तव में अहोभाव की कविताएँ हैं। वैसे यह अहोभाव उनकी कविताओं में सर्वत्र व्याप्त है। आपाधापी के इस युग में यह संतोष और कृतज्ञ-भाव दुर्लभ है। अर्थ यही कि उन्होंने मानव के रूप में जन्म लेने की सार्थकता को अथवा जीवन की सार्थकता को जान लिया है, समझ लिया है और अनुभव भी कर लिया है। यहीं से उनकी कविता का उत्स होता है। कवि अधिकांशतः अपने आस-पास के जीवन से ही भाव-पूर्ण प्रसंगों की खोज करता है और अपने अनुभवों से संवलित कर उन्हें अभिव्यक्त करता है। कवि की भावना इधर-उधर प्रसार कर बीहड़ जंगल का निर्माण नहीं करती अपितु सहज प्राप्त जमीन में गहरे उतर कर पुष्पवत् प्रस्फुटित होती है। ‘कविता कानन कहलाता है’ कविता गहन अनुभूति के साथ-साथ लोकगीति के प्रभाव में सनी सहज-सरल आडंबर-विहीन अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है–

मत बहलाओ मुझको प्रियतम !
जग की है यह रीत पुरानी॥ 
अपने हाथों आग लगाकर 
पीछे ढोते फिरते पानी॥ 

डॉ. गौतम की कविताओं में जीवन की सहज अनुभूति, आस्था और प्रौढ़-संदर्शन सद्य-सुलभ है। संग्रह की  कविताओं को पढ़ कर द्विवेदी युग की सामाजिक सोदेश्यता और अभिव्यक्ति शैली का सहज स्मरण हो आता है।  

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