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किससे माँगें अपनी पहचान

हिय में उपजी,
पलकों में पली,
नक्षत्र-सी आँखों के
अम्बर में सजी,
पल-दो-पल
पलक-दोलों में झूल,
कपोलों में गई जो ढुलक,
मूक, परिचयहीन
वेदना नादान,
किससे माँगें अपनी पहचान।

 

नभ से बिछुड़ी,
धरा पर आ गिरी,
अनजान डगर पर
जो निकली,
पल-दो-पल
पुष्प-दल पर सजी,
अनिल के चल-पंखों के साथ
रज में जा मिली,
निस्तेज, प्राणहीन
ओस की बूँद नादान,
किससे माँगें अपनी पहचान।

 

सागर का प्रणय लास
बेसुध, वापिका
लगी करने नभ से बात
पल-दो-पल
का वीचि-विलास
शमित शर ने
तोड़ा तभी प्रमाद
मौन, अस्तित्वहीन
लहर नादान
किससे माँगें अपनी पहचान।

 

सृष्टि! कहो कैसा यह विधान
देकर एक ही आदि-अंत की साँस
तुच्छ किए जो नादान
किससे माँगें वो अपनी पहचान।

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