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माँ (भूपेन्द्र हरदेनिया ’मौलिक’)

    माँ
कहने को 
शब्द मात्र,
 
एक उद्बोधन
 
उस स्त्री के लिये
जो हमारी
जन्मदात्री है।
 
पर वह अपनी
गुरुता में
दुनिया के सभी
शब्दों से भारी है।
 
वह एक ध्वनि है
नाद के मामले में
सबसे अधिक
ध्वन्यात्मक,
 
एक अंतर्ध्वनि है वह
जो गुंजायमान
होती है
हृदय पटल से लेकर
आत्मा की 
उन गहराइयों में
जहाँ ॐकार
सदैव विद्यमान रहता है,
 
परा तक पहुँचकर
वह शब्द घुला लेता
अपने में
परमात्मा के 
उस उच्चारण को भी
जिसे हम 
माँ से विलग कर
जपते हैं हमेशा,
 
एक कठोर 
ढाल 
है वह
 
विपत्ति के समय
तूणीरों
और तलवारों
के समक्ष 
आकर
अड़ जाती
है 
उससे
जो उसके
अंश
के
लिए घातक है
 
माँ 
वह शब्द
जो
देयता में
सर्वोच्च
दानवीर है। 
 
उसके
समक्ष
हम
सब याचक हैं,
 
फिर भी 
हम 
भागते हैं
कई बार
काल के
और माया 
के वशीभूत होकर 
इस शब्द से,
 
लेकिन
वह करता रहता है
पीछा
हमेशा
और 
हम दौड़ते रहते हैं
अपने प्रमाद में,
 
हम दौड़ते रहते हैं
अपने 
सामर्थ्यानुसार,
 
पर थककर रुकते ही
यह शब्द
आ पकड़ता है
फिर हमारी
बाँह 
धँस जाता है
हृदय की
अंतरतम 
गहराइयों में फिर से
अपने
दुलार
वात्सल्य प्रेम
और बचपन 
की उन ख़ूबसूरत 
यादों के साथ 
जिनका लौटना
संभव नहीं है
अब
 
वे
सारे बिम्ब
हमारे समक्ष
उभर आते हैं,
वैसे ही जैसे
हम जीते थे
तब
अपने अबोध रूप में
और फिर
हम
कहते हैं
सिर्फ़ और सिर्फ़
माँ! 
हे माँ!
 
लेकिन 
माँ नहीं होती 
फिर!

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