अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

माँ (दीपा जोशी)

जीवन वन में स्‍वच्‍छंद सुमन सी 
अंबर चुंबी हिमश्रृंगों सी 
                   विधु की प्राणमयी धारा सी 
                   माँ गंगा की निर्मल काया सी 


स्‍नेहमयी घन अम्‍बर जैसी 
ममतामयी शीतल समीर सी 
                   विशाल हृदयी अथाह सागर जैसी 
                   माँ की छवी परम पावन सी


भोर की प्रथम उज्‍जवल किरण सी 
सघन धूप में छाँव सी 
                   गोधुली में दीपक जैसी 
                   माँ निशापथ में तारक सी


भाषा में स्‍वर व्‍यंजन जैसी 
गीतों में सुर ताल सी 
                   वीणा के मधुर सुरों सी 
                   माँ मुरली की तान सी


वेदों के ज्ञान जैसी 
गीता के सार सी 
                   गुरमुख की वाणी जैसी 
                   माँ काबा काशी सी 


चिर सखी राधा जैसी 
पथ दृष्‍टा सुरदर्शन सी 
                   देव सृष्‍टि की प्रतिकृति सी 
                   माँ महातरु छाया सी 


श्रद्धा की परिभाषा जैसी 
जीवन का विश्‍वास सी 
                   धरा के धैर्य का प्रतिरूप सी 
                   माँ स्‍‍र्वज्ञय ज्ञाता सी 


हृदय में स्‍पंदन जैसी 
श्‍वास निश्‍वास के बंधन 
                   रोम रोम में रुधिर सरीखी 
                   माँ परम कल्‍याणी सी 


देवालय की अनुपम मूरत सी 
गिरजा घर की सुखद शान्‍ति सी

 

पारस सी शक्‍ति धारणी 
माँ तुम ही परमेश्‍वर हो
माँ तुम ही परमेश्‍वर हो

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं