अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

माथे पे बिंदिया चमक रही

माथे पे बिंदिया चमक रही
हाथों में मेंहदी महक रही।

शर्माते से इन गालों पर
सूरज सी लाली दमक रही।

खन-खन से करते कॅगन की
आवाज़ मधुर सी चहक रही।

है नये सफ़र की तैयारी
पैरों में पायल छनक रही।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

आज फिर साथ दे
|

आज फिर साथ दे हाथ में हाथ दे तू हमारे लिये…

जब तक चले ये ज़िंदगी चलते रहो
|

जब तक चले ये ज़िंदगी चलते रहो, ना हारना तुम…

शब्द को कुछ इस तरह तुमने चुना है
|

शब्द को कुछ इस तरह तुमने चुना है। स्तुति…

शून्य से शिखर हो गए
|

शून्य से शिखर हो गए। और तीखा ज़हर हो गए॥…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल

बाल साहित्य कविता

पुस्तक चर्चा

कविता

गीतिका

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं