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मैं (विमल शुक्ला ’विमलेश’)

कुछ हँसता हूँ कुछ रोता हूँ,
कुछ पाना है कुछ खोता हूँ,
कुछ लिया अभी कुछ सौंप दिया,
कुछ गढ़ना था कुछ तोड़ दिया,
कुछ क़ैद कई दिन था अंदर ही,
बाहर लाकर छोड़ दिया,
कपड़े ये साथ मेरे कुछ पल,
प्रतिपल कुछ घटता बढ़ता हूँ,
बाहर से अंदर आना है,
अंदर से बाहर जाता हूँ,
कुछ जगना है कुछ सोता हूँ,
कुछ बनना है कुछ मिटता हूँ,
कुछ हँसता हूँ कुछ रोता हूँ,
कुछ पाना है कुछ खोता हूँ॥


जानूँ कैसे यह "सत्य" है क्या,
कैसे पहचानूँ "शुद्ध" है क्या,
अब तो इस बूझ से छिपता हूँ.
मेरी यह खोज अधूरी है,
हर अवयव इसका चोरी है,
मैंने अपना क्या जोड़ा है,
अस्पृश्य नहींं कुछ छोड़ा है,
कुछ तोड़ लिया कुछ फाड़ लिया,
कुछ बीन लिया कुछ झाड़ दिया,
इतना ही हूँ पर सबकुछ हूँ,
जितना कम उतना ज़्यादा हूँ,
मैं तो हर मैं के अंदर हूँ,
मैं से ही तुम तक आता हूँ,
कुछ हँसता हूँ कुछ रोता हूँ,
कुछ पाना है कुछ खोता हूँ॥

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