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मेरे आँगन का वो शहतूत का पेड़ 

 आज मेरी स्मृतियों में अतीत की कुछ यादें उमड़ने लगी। मेरे आँगन में एक शहतूत का पेड़ था, जिसकी घनी छाया में हम बचपन में खेला करते थे। उस समय शहतूत पर ढेर सारी चिड़ियों ने अपने नीड़ बना रखे थे। चिड़ियों के बनाए नीड़ से पूरा शहतूत का वृक्ष भर गया था, जिससे वह देखने में बहुत ही सुंदर लगता था। रोज़ सुबह और शाम के समय ढेर सारी छोटी बड़ी चिड़ियाँ जब एक साथ कलरव करती थीं, तो कलरव से पूरा घर आँगन भर जाता। उस शहतूत के वृक्ष पर सेम की लताओं ने अपना घर बना लिया था, जिससे शहतूत का आकार झाड़ी जैसा लगता था। धीरे-धीरे ऐसे ही समय बीतता रहा। हम रोज़ भाई-बहनों और अपने मित्रों के साथ शहतूत के वृक्ष की घनी छाया में अपना घरौंदा बनाकर खेला करते। उस वृक्ष पर चिड़ियों के साथ-साथ कुछ क्रूर कौवे भी आ जाते थे और अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण चिड़ियों के नीड़ को गिरा कर चले जाते। बेचारी चिड़िया तिनका- तिनका सहेज कर घर बनाती और वह दुष्ट और नीच प्रकृति कौवे उसे एक क्षण में नष्ट कर देते थे। उस समय हमें इस बात का अहसास नहीं था कि चिड़ियों को इससे परेशानी होती है। हम चिड़ियों के घोंसले को पाकर बहुत ही ख़ुश हुआ करते थे। रोज़ सुबह हम घोंसले की तलाश में रहते हैं कि कब कोई कौवा आए और घोंसला गिरा कर चले जाए, और हम उसे बैग के जैसे इस्तेमाल करें। कौवे आते घोंसला गिराते और चले जाते। हमारी प्रतिदिन की यह दिनचर्या बन गई थी। हम चिड़िया के घोंसले को पाकर फूले नहीं समाते। 

पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि हम द्रवित हुए बिना नहीं रह सके। प्रतिदिन की भाँति हम घोंसला उठा ही रहे थे कि अचानक हमें चिड़िया के दो छोटे-छोटे बच्चे दिखाई दिए, जो मरणासन्न अवस्था में पड़े हुए थे। हमारा ध्यान अब घोंसले से हटकर चिड़िया के छोटे बच्चों पर आ गया। हम सभी चिल्लाने लगे। मम्मी-मम्मी देखो चिड़िया के बच्चे नीचे गिरे हुए हैं। फिर हमने उसे उठाया रुई में रखा और उसे दूध पिलाने की कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। हमने उसे उसके गिरे हुए घोंसले में उठा कर डाल दिया। रुई बिछाकर उसे शहतूत की एक डाली में टाँग दिया। कुछ समय बाद उसे रुई से दूध पिलाया। रात हुई हम सो गए रात में हवा के झोंके या किसी जानवर ने उस घोंसले को उड़ा दिया था। सुबह जब हम उठे घोंसला डालियों पर नहीं था। हमें बड़ा अफ़सोस हुआ। माँ ने बताया कि कौवे बड़े दुष्ट होते हैं। वे चिड़ियों के घोंसले को बर्बाद कर देते हैं और बच्चों को नुक़सान पहुँचाते हैं। चिड़िया बेचारी मेहनत से तिनका-तिनका इकट्ठा करती है तब जाकर घोंसला बनता है। माँ की बातें हमारे दिल को छू गईं। पर अब हम कर भी क्या सकते थे। उस पल को जब भी याद करती हूँ, मन द्रवित हो जाता है और वह बचपन के आँगन वाला शहतूत का पेड़ याद आता है।

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