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मेरा कहा कहाँ सुनती हो माँ!

लो माँ
आज फिर से अव्वल रहीं हैं हम
तुम्हारे लाड़ले
वंशधरों को पीछे छोड़ते हुए,
यहीं थमेंगे नहीं हमारे क़दम
अब
अन्तरिक्ष में भरेंगी कुलाँचें
धरती को
समेट लेंगी बाँहों में
क़ैद कर लेंगी
आँधियों को साँसों में
समन्दरों का खारापन हर
घोल देंगी मिठास
इस लोक में;
 
क्या तब भी
तुम नहीं मुस्कराओगी माँ?
या फिर
यही दुआ करोगी कि काश
इस जगह मेरा बेटा होता!
 
ऐसी क्यों हो माँ!
क्या भूल गयी तुम
जब घर के चिराग़
बाहर कहीं
कन्दुक क्रीड़ा में लीन होते हैं
हम ही होतीं हैं आस-पास
तुम्हारे दुखों की हमसफ़र
सँवारतीं हैं घर
बढ़ाती हैं सौहार्द परिवार में
करतीं हैं रफ़ू रिश्तों को
भरती हैं मुस्कान
तुम्हारी उदासियों में
पिता की फटकार खाकर
जब तुम किसी एकान्त कोने में
उलीचती हो अपना दुख
हमारी आँखों से
झरते हैं आँसू
रात.दिन हम
तुम्हारे ही साथ खटती हैं
शादी के बाद भी
हमारी आस्थाएँ
पीहर में ख़ूब बँटती हैं;
 
मगर
जब हमारे क़त्ल की साज़िशें चलती हैं
मेरा कहा कहाँ सुनती हो माँ
साथ देती हो तुम पिता का
और भ्रूण में ही
हो जाते हैं खण्ड-खण्ड
तमाम स्वप्न
मेरी अजन्मी बहनों के;
 
यदि वे भी उतरतीं
धरती पर
तो छू लेतीं आकाश
हर लेतीं समन्दरों का खारापन
घोल देतीं मिठास
इस लोक में!

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