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पादप शिशु

नव अंकुरित शिशुरूप पादप, बीजगृह को छोड़कर।
उन्मुक्त होकर उठ खड़ा था, हरित बाना ओढ़कर॥


सोचता था मन ही मन में, जब बड़ा हो जाऊँगा।
दृढ़काय होकर इस किनारे पर खड़ा हो जाऊँगा॥


हर शाख में करने बसेरा, आ बसेंगे खग बेचारे।
छाँव में सुख पाएँगे, जो भी हों आतप के मारे॥


जब भी गुज़रेंगी यहाँ से, बालकों की टोलियाँ।
मैं बड़े सुख से सुनूँगा, उनकी प्यारी बोलियाँ॥


मेरी सूखी डालियों से, काठ जो नीचे गिरेगी।
वह हवन की अग्नि में या, भोजहित ईंधन बनेगी॥


यदि कोई भूखा कहीं से, पास मेरे आएगा।
अमृत सरीखे सरस फल, तोड़ करके खाएगा॥


ताप आतप स्वयं लेकर, सबका मग सुखमय करूँगा।
वायु का विष मैं पियूँगा, सबको सुरभित गंध दूँगा॥


धरती माँ का पुत्र हूँ, मुझसे ये सेवित रहेगी।
प्राण मेरे क्यों न जाएँ, माँ मगर जीवित रहेगी॥


टूट कर पल्लव अमित ये, धरा में मिल जायेंगे।
भूमि की क्षमता बढ़ेगी, पादप नए खिल जाएँगे॥


बस यही था सोचता, सीधा खड़ा पादप बेचारा।
अगले पल ही गिर पड़ा, किसने उसे निर्दोष मारा॥


ऐसा क्या उसने था माँगा, जो नहीं उसको मिला।
निर्दोष पादप शिशु मरा है, क्या करें किससे गिला॥


वह पड़ा अब भी वहीं पर, कह रहा है अलविदा।
सुख से रहना दुनिया वालो, मुझको दे दो अब विदा॥


हे हरित शिशुरूप पादप, तेरी पीड़ा जानता हूँ।
तेरे घायल तन का कारण, स्वयं को मैं मानता हूँ॥


जा रहा तू छोड़कर है, इसलिए मैं रो रहा हूँ।
जल्दी आना लौटकर तू, बीज नव मैं बो रहा हूँ॥

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