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सोशल मीडिया के रास्ते प्रसिद्धि के वैकल्पिक सोपान

हर इंसान जीवन में प्रसिद्ध होना चाहता, नाम कमाना चाहता है। नेता लोग भले ही "आम आदमी" की टोपी पहने हुए लोगों को टोपी पहनाए लेकिन आम आदमी हमेशा से आम ना रहकर, ख़ास बनना और दिखना चाहता है और ख़ास दिखने की ये आस सदियों से चली आ रही है क्योंकि इंसान का अहम हमेशा उसे वहम में रखता है कि उसका जन्म नहीं बल्कि अवतार हुआ और कुछ साधारण कर जीवन व्यर्थ करने का कोई अर्थ नहीं है।

पहले लोग नाम और दाम दोनों एक साथ कमाते थे। ऐसा लगता था मानो दोनो जुड़वाँ भाई हों क्योंकि जहाँ पैसा वहाँ प्रसिद्धि और जहाँ प्रसिद्धि वहाँ पैसा। लेकिन समय ने "स्लीप वेल" के मैट्रेस पर करवट ली, नाम और दाम दोनों जुड़वाँ भाई अब अपनी स्वतंत्र पहचान बनाकर, एक दूसरे पर निर्भरता समाप्त कर, अपना अलग-अलग कारोबार शुरू कर चुके हैं। अगर आप क़िस्मत के धनी हैं तो प्रसिद्धि को ख़रीद भी सकते है, ख़रीदी हुई वस्तु अधिक प्यारी और मूल्यवान लगती है बनिस्बत मेहनत से अर्जित की हुई वस्तु के, क्योंकि काम बोले या ना बोले पैसा ज़रूर बोलता है।

सिद्ध के बदले प्रसिद्ध होने की माँग मार्किट में ज़्यादा है क्योंकि सिद्ध होने के लिए तप की ज़रूरत होती है और इसमें समय भी अधिक लगता है जबकि प्रसिद्ध होने के लिए ट्रिक चाहिए होती है और समय भी "औक़ातानुसार" ही लगता है। माँग-आपूर्ति का यूनिवर्सल रूल जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। जब माँग विकराल रूप धारण कर ले तो उसकी आपूर्ति के लिए उसी अनुपात में संसाधन जुटाना ज़रूरी हो जाता है वरना माँग-आपूर्ति का गैप किसी भी ऐप से पूरा करना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया ने सूचना के क्षेत्र में क्रांति का आगाज़ तो किया ही है, साथ ही साथ प्रसिद्धि की माँग को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण "आपूर्ति स्त्रोत" की भूमिका भी निभाई है।

फ़ेसबुक हो चाहे ट्विटर दोनों माध्यमों ने प्रसिद्धि को उतनी ही आसानी से उपलब्ध कराया है जितनी आसानी से प्रधानमंत्री जी मन की बात उपलब्ध करवाते हैं। आम आदमी जिसे अपनी सोसाइटी का चौकीदार भी होली-दीवाली की बख़्शीश लेने के अलावा नहीं पहचानता वो भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर रोज़ लाखों फ़ॉलोवर्स की सेना लेकर, उन पर हज़ारों लाईक/कमेंट/शेयर्स का गोला-बारूद लादकर क्रांति का शंखनाद करता है। जिन लोगों के आचरण को उनके घर में कोई फ़ॉलो नहीं करता है वो ट्विटर पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से फ़ॉलो-बैक ले लेते हैं। जो लोग अपनी मर्ज़ी से घर पर रिमोट का कवर नहीं चुन पाते वो भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर अपने पसंद के मंत्री/मुख्यमंत्री चुनकर अपने फ़ॉलोवर्स के दम पर उनके पक्ष में अभियान चलाते हैं।

वास्तविक दुनिया की तरह ही सोशल मीडिया के सेलेब्रिटीज़ के भी फ़ैन होते है जो केवल "चल बाज़ू हट, हवा आने दे" कहने के काम आते हैं। वास्तविक जीवन के सेलिब्रिटीज़ अपने प्रशंसको को ऑटोग्राफ दे कर उनके साथ फोटो खिंचवाकर उनको ख़ुश करते है जबकि सोशल मिडिया के सेलिब्रिटीज़ कुछ ज़्यादा व्यस्त रहने के कारण कभी कभी फ़ेसबुक लाइव आकर या अपनी पोस्ट पर प्रशंसको के कमेंट लाइक करके उन्हें धन्य कर देते हैं।

सोशल मीडिया के सेलिब्रिटीज़ समय-समय पर शक्ति प्रदर्शन भी करते रहते हैं ताकि बाक़ी लोगों को अपनी ताक़त का अहसास करवाते रहें और ये शक्ति प्रदर्शन अपनी पोस्ट्स पर अधिकाधिक लाइक/कमेंट/शेयर्स का आह्वान करके किया जाता है। लाइक/कमेंट/शेयर्स वो सीढ़ी है जिस पर चढ़कर आम इंसान प्रसिद्धि की ऊँचाइयों को प्राप्त करता है और इसके लिए बीवी से छिपकर कई जीबी डेटा की आहुति देनी होती है। आपको बस किसी पार्टी या विचारधारा का झंडा उठाना होता है उसके बाद आपकी पोस्ट्स या ट्वीट्स लाइक अपने आप उठा लेती है।

ऐसे सभी प्रसिद्ध व्यक्ति जब सोशल मीडिया पर लॉग-इन करते हैं तो मन ही मन ऐसी फ़ीलिंग लाते हैं मानो कुछ ही क्षणों में प्रशंसको की भीड़ आकर इन्हें घेर लेगी और वो हाथ हिलाकर उनका अभिवादन करेंगे। ये सेलिब्रिटी वाली फ़ीलिंग इतनी जीवट होती है कि ग़लती से भी कभी इन्हें लॉग-आउट करने की फ़ीलिंग आ जाए तो सिहर उठते हैं। अगर कभी नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से इंटरनेट काम करना बंद कर दे तो ऑक्सीजन की कमी से इनके मुँह से झाग निकलने लगती है।

प्रसिद्धि की इतनी सहज उपलब्धता ने कई लोगों को असहज बना दिया है । प्रसिद्ध लोग जब अपनी 1000-2000 लाइक वाली किसी पोस्ट पर किसी कमेंट का रिप्लाई करते हैं तो अपने शब्दों से ऐसा आभामंडल रचते हैं मानो कमेंट नहीं कर लाखों लोगों की सभा को संबोधित कर रहे हों। हालाँकि अपनी हर पोस्ट पर 1K/2K लाइक लेने वाले इन सेलिब्रिटीज़ के सारे पोस्ट्स चोरी "के" होते है।

ये लोग सारा दिन फ़ेसबुक/ट्वीटर पर ही विचरण करते हैं लेकिन तब तक किसी मुद्दे का संज्ञान नहीं लेते है जब तक इनके फ़ॉलोवर्स इनको 40-50 पोस्ट्स/ट्वीट्स में इनको मेंशन/टैग करके इनके लिए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ना लाएँ।

सोशल मीडिया के इन सारे प्रसिद्ध लोगों का एक पर्यायवाची "पब्लिक फ़िगर" भी है। जिस गति से फ़ेसबुक पर पब्लिक फ़िगर वाले पेज बन रहे है उसे देखकर लगता है की 2019 तक केवल केजरीवाल ही आम आदमी बचेंगे। आम आदमी की इतनी किल्लत होने से आम आदमी होने की ज़िल्लत अपने आप अपना अस्तित्व खो देगी। 

इन पब्लिक फ़िगर्स को देखकर ये भी पता चलता है की पिछले कुछ समय में परिवहन के क्षेत्र काफ़ी प्रगति हुई है क्योंकि अब आम आदमी एक सामान्य प्रोफ़ाइल से पब्लिक फ़िगर बनने की दूरी द्रुत गति से तय कर लेता है।

सोशल मीडिया के आभासी जीवन ने लोगों को लोकप्रियता पाने का वैकल्पिक रास्ता दिखाया है लेकिन ये रास्ता कितने पड़ाव पार कर किस मंज़िल की और जाता है इस पर कोई भी सवाल पूछने पर सेलिब्रिटी लोग अभी कांग्रेस पार्टी की तरह ही "क्लूलेस" नज़र आते हैं।

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