अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

स्त्री चिंतन की अंतर्धाराएँ और समकालीन हिंदी उपन्यास: नारी जागरण का सुसंदर्भित विमर्श

 

पुस्तक: स्त्री चिंतन की अंतर्धाराएँ और समकालीन हिंदी उपन्यास 
लेखक: डॉ. प्रदीप श्रीधर 
प्रकाशक: तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 
मूल्य: ₹250 
पृष्ठ: 144  

 

वर्तमान समय में उपन्यास साहित्य की सबसे सशक्त विधा है। उपन्यास के माध्यम से जीवन में होने वाली घटनाओं व तथ्यों को गत्यात्मक रूप से पाठक के समक्ष लाया जाता है। जीवन की अनेक समस्याएँ उपन्यासों के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं व समाधान पाती हैं। लेखक के शब्द पाठक के भावों से जुड़कर उपन्यास को आँखों देखे वर्णन में प्रतिरूपित कर देते हैं। कदाचित् इसीलिए मुंशी प्रेमचंद ने उपन्यास को मानव जीवन का चित्रमात्र कहा है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहने के कारण विभिन्न समस्याओं-विकृतियों-आदर्शों आदि से उसे दो-चार होना पड़ता है। विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याओं को चित्रित करने वाले उपन्यास सामाजिक उपन्यास कहलाते हैं। हिंदी उपन्यास जगत् में समाज के यथार्थ रूप का चित्रण प्रेमचंद युग की देन मानी जाती है। प्रेमचंद ने सुधारवादी दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में मानवतावाद व आदर्शवाद की परम्परा को मुखरित किया। प्रेमचंद के पश्चात् लेखकों की ऐसी लम्बी परम्परा है, जिन्होंने सामाजिक उपन्यासों की रचना की। इन उपन्यासों में जाति-पाति, अंधविश्वास, किसानों का शोषण, अशिक्षा, राजनीति आदि को उभारा गया। इसी क्रम में महिलाओं की समस्याओं पर भी कथानकों का सृजन किया गया। अनमेल विवाह, बहुविवाह, तलाक़, विधवा विवाह, बाल विवाह, वैधव्य, पर्दाप्रथा जैसी समस्याएँ लेकर जब ये उपन्यास अवतीर्ण हुए तो लोगों का ध्यान इनकी ओर आकर्षित हुआ। प्रेमचंद ने अपने अनेक उपन्यासों में नारी जीवन की समस्याओं व उनके आदर्शवादी समाधानों पर अपनी क़लम चलाई है। प्रेमचंद की सूक्ष्मदृष्टि, पकड़ व गाम्भीर्य की ओर सबका ध्यान गया। स्त्रियों की स्थिति का यथार्थ चित्रण जब समाज ने देखा तो समाज की दृष्टि इस ओर भी गई। इससे एक नया विमर्श उत्पन्न हुआ ‘स्त्री चिंतन का विमर्श’। वैदिक काल में नारियों को देवी की उपमा प्रदान की गई। आदिकालीन साहित्य में वह सुलभ वस्तु मानी गयी। भक्तिकाल में उसे माया-मोहिनी की संज्ञा मिली तो रीतिकाल में नारी शृंगार व भोग की वस्तु बन गयी। आधुनिक काल में नारी की स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आया। उसे अपने अस्तित्व का आभास हुआ। परिवार व समाज की सीमाओं से बाहर निकलकर नारी ने अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयत्न किया और बहुत हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की। 

डॉ. प्रदीप श्रीधर की आलोचनात्मक कृति ‘स्त्री चिंतन की अंतर्धाराएँ और समकालीन हिंदी उपन्यास’ इस ज्वलंत व महत्त्वपूर्ण विषय पर उनके व्यापक चिंतन का प्रतिफल है। पितृसत्तात्मक-पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता की सामाजिक संरचना का विश्लेषण व विवेचन प्रस्तुत कृति में किया गया है। अध्ययन की सरलता के लिए कृति दो खंडों—विचार खंड व मूल्यांकन खंड में विभाजित है। विचार खंड में कुल पाँच अध्यायों के अन्तर्गत स्त्री विमर्श का इतिहास, भारतीय संदर्भ में स्त्री सशक्तिकरण, गाँधीवाद का प्रभाव व समकालीन परिदृश्य में स्त्री विमर्श का स्वरूप दर्शाया गया है। कृति का प्रथम अध्याय ‘भारतीय नवजागरण: स्त्री अस्मिता के संदर्भ’ भारतीय समाज में इस मुद्दे पर जागरूकता का सुन्दर इतिहास दर्शाता है। लेखक ने नवजागरण के अर्थ को परिभाषित करते हुए इस कार्य में समाज-सुधारकों की भूमिका का सम्यक् वर्णन किया है। सखी समिति (1886), गुजराती स्त्री मंडल (1903), भारतीय महिला परिषद् (1904) जैसे महिला संगठनों ने इस दिशा में महती भूमिका निभाई। इन महिला संगठनों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में योगदान की विस्तृत चर्चा विद्वान लेखक ने की है। लेखक का इस संदर्भ में कथन उचित ही है, “बीसवीं सदी के प्रथम अर्द्धांश को ‘नारी जागरण का युग’ कहा जा सकता है और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जो युग आरंभ हुआ उसे ‘नारी प्रगति का’। ”

पुस्तक का द्वितीय अध्याय ‘स्त्री सशक्तिकरण के भारतीय संदर्भ’ वर्तमान समय में भारत की स्त्री जनसंख्या का सांख्यिकीय निदर्शन करता है। स्त्री शक्ति का आकलन, इसके बाधक तत्त्व; इसके सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक संदर्भ व इस दिशा में किए गए प्रयासों का पूर्णतया सुसंदर्भित आँकड़ेवार वर्णन यहाँ है। लेखक ने विभिन्न आयोगों व योजनाओं की विस्तृत सूची भी इस संदर्भ में दी है, जिसमें आँकड़ों को दर्शाकर अपनी बात प्रमाणित भी की गई है। ग्रामीण परिवेश की महिलाएँ आज भी पिछड़ी व शोषित हैं। लेखक ने इसे चुनौती के रूप में माना है व इनके समुत्थान के कारगर उपाय भी सुझाए हैं। 

गाँधी जी का भारतीय राजनीति में पदार्पण अनेक नये विमर्शों को साथ लेकर आया है। बेसिक शिक्षा, नारी उत्थान, मद्यनिषेध, स्वच्छता जैसे मुद्दों पर हमें पूरा गाँधी दर्शन मिलता है। ‘गाँधीवाद की भूमिका और नारी उत्थान’ नामक तृतीय अध्याय में महात्मा गाँधी के विचारों पर लेखक ने मनन किया है। वेश्या उद्धार, पर्दाप्रथा का विरोध, बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन, सती प्रथा की निंदा, अंतर्जातीय विवाह का समर्थन जैसे उपखंडों में गाँधीजी को समग्रता के साथ समझा जा सकता है। लेखक अंत में निर्णय देता है, “वर्तमान वैश्वीकरण के संदर्भ में स्व अस्तित्वनिर्मात्री नारी, गाँधीजी के पूर्ण मानवीय लक्षणों से युक्त नारी का अधिकांश अंश में प्रतिनिधित्व करती है।” आज की बालिका कल की नारी है। जितनी शिक्षित बालिका होगी, उतनी ही शिक्षित आने वाली पीढ़ियाँ होंगी। कृति का चौथा अध्याय ‘बालिका शिशु: समकालीन परिदृश्य की चुनौतियाँ’ को बालिकाओं के अधिकार का घोषणापत्र कहा जा सकता है। विद्वान लेखक ने बालिकाओं की सामाजिक स्थिति पर यहाँ प्रकाश डाला है। पुरुषवादी समाज में स्त्री का वर्चस्व नहीं है। समाजवैज्ञानिक इस दिशा में शोधरत् हैं। यद्यपि सैद्धान्तिक रूप से स्त्री-पुरुष को समान माना गया है परंतु व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। आज भी लड़कियों की अशिक्षा, बाल-विवाह, भ्रूणहत्या जैसी सामाजिक कुत्साओं से हम दो-चार होते हैं। लेखक ने इसका एक बड़ा कारण बालश्रम को भी माना है। विभिन्न मौलिक अधिकारों, नीतिनिर्देशक तत्त्वों के निर्देशों के बावजूद भी यह एक बड़ी समस्या है। इसी क्रम में पाँचवा अध्याय ‘कामकाजी महिला और समकालीन परिदृश्य’ भी रखा जा सकता है। आदिकाल से ही स्त्री को घरेलू काम करने की सीख दी जाती रही है। तब से लेकर अद्यावधि स्त्रियाँ घरेलू कामों के साथ-साथ बाहरी नौकरियों में भी अपना वर्चस्व रखने लगी हैं। वैसे आज स्थिति यह है कि घरेलू महिलाओं की तुलना में कामकाजी स्त्रियों का सामाजिक-आर्थिक स्तर ऊँचा होता है परंतु विडम्बना यह भी है कि आज भी स्त्री को निर्णय लेने में पति-परिवार की आज्ञा का पालन ही करना पड़ता है। उसकी अपनी स्वतंत्रता इन अर्थों में अर्थहीन हो जाती है। कामकाजी महिलाओं से परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। 

वास्तव में पुस्तक का विचार खंड, स्त्री विमर्श का समाजशास्त्रीय विवेचन प्रस्तुत करता है। विभिन्न आँकड़ों के प्रयोग लेखक की बात को पुष्ट व प्रमाणित करते हैं। नारी सशक्तिकरण का सैद्धान्तिक आधार प्रस्तुत खंड तैयार करता है। पुस्तक का द्वितीय खंड ‘मूल्यांकन’ खंड है। इस खंड में कुल दस उपन्यासों की समीक्षा स्त्री अस्मिता के संदर्भ में की गई है। ये उपन्यास नारी-केंद्रित विमर्श की भूमिका निभाते हैं। विभिन्न चिंतकों-विचारकों की दृष्टि में जब नारी विमर्श, स्त्रीवाद, स्त्री चिंतन जैसे शब्द आए; तब फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में इन सामाजिक आंदोलनों का सूत्रपात हुआ। प्रारम्भिक चरण में इसके दो रूप दिखाई देते हैं—फ्रांसीसी स्त्रीवाद जो साहित्य से जुड़ा था और दूसरा अमेरिकी स्त्रीवाद जो राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा था। भारत में इस विमर्श पर पश्चिम से आयातित होने का आरोप लगाया जाता है, परंतु यह सत्य नहीं है। वैदिक काल से ही हमारे यहाँ नारी को देवी का रूप मानकर उसकी प्रशंसा और स्तुति की गई है। वर्तमान समय में लेखक ने नारी विमर्श की चर्चा करते हुए नारी के सभी रूपों को प्रदर्शित किया है। डॉ. प्रदीप श्रीधर ने इसी परिप्रेक्ष्य में कुल दस उपन्यासों को चुना है जो नारी सशक्तिकरण के आख्यान बनकर हमारे सामने आते हैं। उषा प्रियंवदा का ‘शेष यात्रा’(1984) अनु के जीवन की कहानी है। अनु का पति प्रणव उसे गुड़िया के सामान सजावटी बनाये रखना चाहता है। अपने आत्म का बोध जब अनु को होता है, तब वह मेडिकल की पढ़ाई करके डॉ. अनु बनती है। इस लम्बी जीवनयात्रा की परिस्थितियों को दर्शाता ‘शेष यात्रा’ नारी सम्वेदना के सच्चे रंग दिखाता है। पति की पारम्परिक दूषित छवि दर्शाता ‘छिन्नमस्ता’(1993) नरेंद्र और प्रिया के वैवाहिक सम्बंधों की कहानी है। इसी क्रम में ‘मुझे चांद चाहिये’(1993), ‘एक पत्नी के नोट्स’(1997) जैसे उपन्यास भी नारी पर लगाए गए आक्षेपों, वर्जनाओं की अभिव्यक्तियाँ हैं। हरिमोहन के उपन्यास ‘अकेले-अकेले साथ’(2000) में नारी की अंतर्व्यथा और मुक्ति-कामना का अंकन किया गया है। स्त्री-पुरुष सम्बंधों में विश्वास व मानवीय सरोकारों का होना आवश्यक है जिनमें समान अधिकार भी शामिल हैं। 

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है, “पुरुष स्वभावत: नि:संग व तटस्थ होता है, नारी ही उसमें आसक्ति उत्पन्न कर उसे नवनिर्माण के प्रति उन्मुख करती है। पुरुष अपनी पुरुष प्रकृति के कारण द्वन्द्वरहित हो सकता है लेकिन नारी अतिशय भावुकता के कारण सदैव द्वन्द्वोन्मुख होती है। इसलिए पुरुष मुक्त है और नारी बद्ध।” मेहरुन्निसा परवेज़ का उपन्यास ‘अकेला पलाश’(2002) ऐसे ही पुरुषपाश में बद्ध नारी तहमीना की कहानी है। डॉ. श्रीधर का निष्कर्ष कितना उचित है, “नारी के शोषण में सिर्फ़ पुरुष ही होता है, यह सारा समाज जानता है। इसके उपरान्त भी दोषी स्त्री ही होती है। उसके लिए क्षमा का अवसर भी नहीं है।” ‘इस दौर में हमसफ़र (2002), अल्मा कबूतरी (2004), आवाँ (2005) जैसे उपन्यास भी स्त्री व्यथा, स्त्री क्षमता व स्त्री संघर्ष की करुणकथा हैं। स्त्री चिन्तन की बदलती लीक को भी यहाँ ध्वनित किया गया है। लेखिका चंद्रकांता का उपन्यास ‘अपने-अपने कोणार्क’(2006) मुख्य चरित्र कुनी के आजीवन कुँवारी रहने का प्रतिचित्रण करता है। कुनी के सारहीन व्यक्तित्व पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों तथा डॉ. त्रिपाठी द्वारा किए गए शोषण को भी हम यहाँ देखते हैं। अंत में नायिका कुनी का आत्मविश्वास पाठकों को झकझोर जाता है और कर्मठता की प्रेरणा देता है। 

प्रस्तुत कृति में डॉ. प्रदीप श्रीधर ने स्त्री विमर्श के संदर्भ में जिन उपन्यासों का चुनाव किया है, वे सभी एक प्रकार से प्रतिनिधि रचनाएँ ही हैं। लेखक का यह चयन प्रभावित करता है। विचार खंड में लेखक का कठिन परिश्रम व स्वाध्याय दिखाई देता है। वास्तव में स्त्री विमर्श पुरुषों का नहीं अपितु उनकी मानवीयता घटाने वाले उस छद्म मुखौटे का प्रतिकार करता है जो मर्दानगी के नाम पर गढ़ा गया है। इससे उत्पीड़न व शोषण की भावनाओं को बल मिलता है। विद्वान लेखक ने विभिन्न निष्कर्षों की कसौटी पर अपनी बात को कसा है। वास्तविकता तो यह है कि पुरुष वर्ग स्त्री-पुरुष समानता की अवधारणा को व्यावहारिक धरातल पर न सह सकता है और न ही स्वीकार कर सकता है। ‘स्त्री चिंतन की अन्तर्धाराएँ और समकालीन हिंदी उपन्यास’ इसी परिदृश्य को विचारात्मकता, विश्लेषण व विवेचना की कसौटी पर कसती है। पुस्तक की भाषा अत्यन्त प्रांजल व परिनिष्ठित है। अधिकांश आलेखों को संदर्भ सहित दिया गया है, जिससे पुस्तक की उपादेयता में सार्थक अभिवृद्धि हुई है। विद्वान लेखक ने गहन शोधात्मक दृष्टि से ऐसे नाज़ुक किन्तु अति महत्त्वपूर्ण विषय पर अपनी समर्थ क़लम चलाई है। 

डॉ. प्रदीप श्रीधर की प्रस्तुत कृति नारी विमर्श की ओर नवीन दृष्टि, सार्थक अनुसंधान और नैसर्गिक चिन्तनाओं का मार्ग प्रशस्त, प्रतिफलित व प्रतिज्ञापित करती है; इसमें संदेह नहीं। वर्तमान में नारी विमर्श पर शोध-समीक्षा-अनुसंधान का स्तुत्य कार्य किया जा रहा है, जिसमें यह कृति मील का पत्थर है। 

डॉ. नितिन सेठी 
सी-231, शाहदाना कॉलोनी
 बरेली (243005)
 मो. 9027422306

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

डाॅ.श्रीकांत मिश्र 2021/07/15 10:27 AM

आप की साहित्यिक दृष्टि बहुत पैनी है। बहुत सुन्दर

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा

अनूदित आलेख

साहित्यिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं