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सुबह का अख़बार

सुबह का अख़बार
दोपहर से शाम तक
रद्दी बन जाता है.
और फिर एक दिन
वो रद्दी का ढेर
आवाज़ लगा कर
कहता है,
कि मुझे उठाओ
और बेच आओ ! 

 

तुम्हारी याद की इंतहा
ये है
कि हीरे से काँच तक
सोने से पीतल तक
और रद्दी से अनमोल तक
हर शै से जुड़ी है
तेरी याद। 

 

मुझे याद है मेरी आदत
मेरे साथ है मेरी आदत
रद्दी के ढेर को उठाना
बैठक के कोने में रखना
और भूल जाना -
तुम्हारा उलाहना,
तुम्हारा डाँटना। 

 

रद्दी का ढेर आज भी है
बैठक का कोना आज भी है
मेरा भूलना आज भी है 
मगर कहाँ गया
तुम्हारा उलाहना,
तुम्हारा डाँटना,
तुम्हारा प्यार,
तुम स्वयं!

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