अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

वफ़ादारी का हलफ़नामा : मानवता और मानवीय व्यवस्था में विश्वास की नए सिरे से खोज का प्रयास

समीक्ष्य पुसत्क: वफ़ादारी का हलफ़नामा”
लेखक: अशोक गौतम
प्रकाशक: पुस्तक प्रकाशन, डी-582, गली न. 3, अशोक नगर, दिल्ली-110093
मूल्य: ₹ 250.00
पृष्ठ: 120


अशोक गौतम का व्यंग्य-संग्रह ‘वफ़ादारी का हलफ़नामा’ एक तरह से तात्कालिक स्थितियों-परिस्थितियों से उत्पन्न उद्वेलन को संबोधित है। समसामयिक परिदृश्य पर एक व्यंग्यकार की नज़र सबसे तीखी रहती है। व्यंग्य विधा के माध्यम से एक संवेदनशील कलाकार राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं और विसंगतियों को प्रखरतापूर्वक उजागर करता है। इस संग्रह में भी राजनीतिक अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, प्रशासन की संवेदनहीनता, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज के अन्यान्य क्षेत्रों में व्याप्त काहिली, अव्यवस्था और दायित्वहीनता आदि के अतिरिक्त व्यक्तिगत स्तर पर व्याप्त अकर्मण्यता, जड़ता और स्वार्थ संपोषित संकीर्णता आदि अशोक गौतम के निशाने पर रहे हैं।

‘भेड़ चुप है’, ‘करारा जवाब’, ‘इ सायकिल अब हमार बा’, ‘साइकिल उदास है’, ‘हे गरीब! तुम कहाँ हो’, ‘अपनी लिस्टें अपनी फिस्टें’, ‘मेनिफेस्टो नहीं मनीफेस्टो’, ‘रामनाम की बोट है’, मल्टीपर्पज चुनावी कैप्सूल’, ‘रोटियां और रोटियों की गोटियां’, बाऊजी को ही मिले’ आदि व्यंग्य सीधे-सीधे राजनीतिक षड्यंत्रों और तुच्छताओं को संबोधित हैं। इस संग्रह की भूमिका में अशोक गौतम ने स्वयं लिखा है—“व्यंग्य का काम समाज में उतना है जितना मैले कपड़े के लिए साबुन का है। व्यंग्य वैचारिक स्तर पर दिमाग़ को साफ़ करने वाला साबुन है।” कहना न होगा कि अशोक गौतम ऐसे जागरूक रचनाकार हैं जो अपने सृजन के माध्यम से एक प्रकार से समाज को मैल के दाग़ भी दिखा रहे हैं और साबुन भी बाँट रहे हैं। ‘भेड़ चुप है’ व्यंग्य में चुनावी लोकतंत्र के यथार्थ को व्यंग्यकार ने बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया है— “लोकतंत्र के समाजसेवी राजा जी को पता था कि चुनाव जीतने के लिए बुद्धिजीवियों की नहीं, भेड़ों की ही ज़रूरत पड़ती है। वे ही वोट डालने के लिए सारा दिन हिम्मत कर लाईन में रह सकती हैं। बुद्धिजीवी एक तो दूसरों के ख़िलाफ़ षड्यंत्रों में, किताबों के जैकेट्स में छिपे, लोकतंत्र को गलियाँ देते घर से बाहर ही नहीं निकलता और जो निकल भी जाता है तो दस मिनट तक लाईन में खड़े होने के बाद ही देश की जनसंख्या को कोसने लग जाता है, सिस्टम को कोसने लग जाता है, .......हर किसी को कोसने लग जाता है। और जब सबको कोस कर थक जाता है तो बिन वोट डाले ही सर खुजलाता दुम दबाए पोलिंग बूथ से खिसक जाता है।” पैसे के दम पर भेड़ों के सरदार को अपने पक्ष में कर भेड़ों की सभा में ख़ालिस ऊन के कम्बल देने की घोषणा करते ही करतल-ध्वनि की गूँज, किन्तु स्कूल से लौटकर जब मेमने को पता चलता है कि नेताजी भेड़ों को शुद्ध ऊन का कंबल देने का वादा कर गए हैं तो मेमने का सवाल देखिए—“पर ऊन किसकी होगी माँ ??” कहना न होगा कि “स्कूल” से आया मेमना अभी भी माँ से ही पूछ रहा है नेताओं से नहीं! और कुछ मेमने वयस्क हो कर बुद्धिजीवी हो गए हैं जो भेड़ों के झुण्ड से अपने आपको अलग कर लेते हैं। लोकतंत्र में तटस्थता वास्तव में राजतन्त्र की अभ्यस्तता की खुमारी तो नहीं? कदाचित् हम राजा को पिता समान मानते आए हैं, इसलिए हमने मुग़लों के भी गुण कान्हा के समान गाए हैं और अंग्रेज़ों में भी हमें शुभ्र-वर्ण मसीहा नज़र आए हैं। फिर 70 वर्ष से नेता यदि भेड़ों को कम्बल बाँटने का वादा कर वोट ऐंठते रहे हैं तो हैरानी नहीं। वास्तव में भीड़ और भेड़ बन कर लोकतंत्र मज़बूत नहीं हो सकता। भेड़ों से अलग-थलग होकर तो और भी नहीं। अशोक गौतम दोनों प्रवृतियों के प्रति सचेत करते हैं।

इस सम्पूर्ण संग्रह को देखें तो नोटबंदी और समाजवादी पार्टी की कलह जैसे तात्कालिक मुद्दे अधिक हावी हैं किन्तु सन्देश तात्कालिक नहीं है। क्योंकि तात्कालिक राजनीतिक विभ्रम तो बहाना है। अर्थ कदाचित् यही है कि लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था अपनी तमाम ख़ामियों के बावजूद यदि पूर्व की व्यवस्थाओं से बेहतर व्यवस्था है तो यह बेहतर तब तक ही है जब तक जनता जागरूक है अन्यथा समाजवाद का ढिंढोरा पीट कर भी राजनेता अपना उल्लू ही सीधा करते रहेंगे। “बाऊजी को ही मिले” नामक व्यंग्य में समाजवादी पार्टी के झगड़े को माध्यम बना कर वास्तव में व्यंग्यकार भीड़ और भेड़ों को ही सचेत कर रहे हैं। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष के पुत्र और वर्तमान अध्यक्ष की उलाहना दर्शनीय है—“आपने मुझे रिक्शा पर चलने के बदले रिस्क होने के बावजूद भी साइकिल पर चलाना सिखाया और मैं शौक-शौक में साइकिल चलाते-चलाते कब सबको चलाने के काबिल हो गया, पता ही न चला। बाऊजी! मुझे पता था कि मैं साइकिल नहीं चला सकता। पर आपने मुझे जबरदस्ती समाजवाद को जिन्दा रखने के लिए साइकिल पर बिठा कर ही दम लिया। और जब मैं गिरता-पड़ता साइकिल संभालने लायक हुआ तो आप मेरी साइकिल की हवा निकाल चाचा के साथ हो लिए।” इस प्रकार यहाँ समाजवाद की अवधारणा के अवमूल्यन पर तो निशाना है ही साथ ही यह भी कि राजनीति का स्वाद जब एक बार लग जाता है तो सारी की सारी अवधारणाएँ पृष्ठभूमि में धकेल दी जाती हैं। व्यंग्य को और धार देते हुए और समाजवाद का मख़ौल उड़ाते हुए गौतम व्यंग्य के वाचक के मुख से कहलवाते हैं—“राजनीति में सब से भयंकर मोह यदि कोई होता है तो बस पुत्र मोह। पर आप तो उससे भी उठकर भाई मोह से ग्रस्त हो गए। ये कौन सा इतिहास पढ़े हो बाऊजी आप ? और वह भी तब जब चुनाव का सूरज आग उगल रहा हो। ये समय तो औरों के पुत्रों को भी अपने पुत्र कहने का होता है बाऊजी! ..... पर आपने क्या किया ? पुत्र से अधिक आपको चाचा प्यारे हो गए ? .....अरे बाऊजी ऐसे दिल्ली कैसे जाओगे?” एक पुत्र का अपने पिता से राजनीति के मैदान में खड़े होकर ये पूछना कि ऐसे दिल्ली कैसे जाओगे? बड़ा अर्थगर्भित है। इस प्रकार गौतम के व्यंग्य-बाण एक साथ कई दिशाओं में मार करते हैं। 

“इ सायकिल अब हमार बा” व्यंग्य के माध्यम से लेखक ने कुर्सी का लोभ और उसके छिनने के डर और लाचारी को ही उजागर नहीं किया है बल्कि वे जनता को सचेत कर रहे हैं कि इस राजनीतिक उठापटक में लोक कहाँ है और लोकतंत्र कहाँ? बानगी देखिए— “इस सायकिल ने एक बाप को इतना मोही बना दिया है कि आज भी सड़क पर किसी और को भी जो उसी की साइकिल पर चलते देखता हूँ, तो मन करता है उससे उसकी साइकिल छीन लूँ। दिन को तो दिन को, रात को भी एक तो नींद आती ही नहीं, पर जो गलती से आँख लग ही जाए तो आँख लगते ही सामने साइकिल दिखने लगती है। फिर एकाएक लगता है जैसे मेरे बुढ़ापे की एक मात्र सहारा साइकिल को मुझसे कोई छीन रहा हो।” और ये क्या ये तो सचमुच उसका बेटा ही है जो गीत गुनगुनाते हुए साइकिल को पुचकार रहा है और पूछने पर सीधे सीधे साइकिल पर अपना अधिकार जतला देता है—“बापू! कहा न! इ साइकिल अब हमार बा! इ हमें दे दो सरकार! चुनाव आयोग ने हमें इ साइकिल दे दी है।” लोकतंत्र का ऐसा मखौल और वह भी समाजवाद के नाम पर! 

‘नई फिल्म की नई कहानी’, ‘ये कैसे दिन आ गए रे बाबा’, ‘अगली सूचना तक रद्द’, असली नक़ली के भ्रम बेशर्म’, ‘समाज से कटने के संकट’, ‘न भाई न’, ‘मेरे घर के काले धनिए’ जैसे व्यंग्य नोटबंदी के बाद की परिस्थितियों, साधारण-जनों को आई मुश्किलों और काले धन को ठिकाने लगाने के प्रयासों से उत्पन्न विडंबनाओं को संबोधित हैं और व्यंग्यकार इस बहाने भी मानवीय चरित्र की काली परतों को उघाड़ने में सफल हुए हैं। ‘मृत्यु पूर्व हरिद्वार यात्रा’, ‘अबके मैरी क्रिसमस में’ आदि व्यंग्यों में धार्मिक मान्यताओं को आड़े हाथों लिया है। स्वच्छता अभियान, पर्यावरण, बाज़ारवाद, सरकारी धन का दुरुपयोग आदि विषय भी अशोक गौतम की नज़र में हैं। धर्म और राजनीति के गठजोड़ पर तो वैसे भी सभी व्यंग्यकार मुखर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं पर गहरा कटाक्ष करते हुए अशोक कहते हैं— “कहते हैं धर्म जोड़ता है। पर मैंने तो इसे तोड़ते-मरोड़ते ही बहुधा देखा। एक ही आदमी को सैकड़ों हिस्सों में टांगते देखा।” 

“जय हो प्रभु की” जैसा व्यंग्य समाज में व्याप्त हर तरह के अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार को अपने निशाने पर लेता है। इस व्यंग्य में अपनी ईमानदारी से ऊब चुका फ़रियादी जब प्रभु से शिकायत करता है– “देखो न प्रभु! बन्दे कितने निडर हो गए है ? वे क़ानून और पुलिस से तो डरते ही नहीं, उन्हें अब तुम्हारा भी डर नहीं रहा। रोज़ हर बुरा काम सीना तान कर यों किए जा रहे हैं जैसे... और जब इनको लगता है कि इनके पाप का घड़ा भरने वाला है, तो इससे पहले कि वह भरे, ये तुम्हारे चलाए तीर्थों पर जा उसे खाली कर पुण्यात्मा हो हरिओम्! हरिओम्! करते लौट आते हैं।” तो प्रभु ऐसे लोगों का ही पक्ष लेते हैं और समझाते हुए कहते है–“जैसे-जैसे समाज में पाप बढ़ेगा, वैसे-वैसे मेरा कारोबार बढ़ेगा। असल में मेरा व्यापार चलता ही ऐसे लोगों के आसरे है। तुम लोगों की मेरे कारोबार में हिस्सेदारी है ही कितनी ? ये पापी, दुराचारी, भ्रष्टाचारी, अनाचारी ही तो मेरे कारोबार का मूल हैं। तुम्हारे भरोसे बैठा रहूँ तो तुम्हारे चढ़ावे से तो मेरे मंदिर में सफ़ेदी भी न हो। ...... बुरा मत मानना दोस्त! अपने दिल पर हाथ रख ज़रा बताओ तो, तुम जैसे ईमानदार आख़िर मुझे देते ही क्या हो? ..........दस रुपए चढ़ाते हो तो हज़ार का काम करवाने का दबाव बनाते हो। इसलिए तुमसे प्रिय तो मुझे ये पापी हैं। चोरी छिपे मेरे द्वार आते हैं और दोनों हाथ जोड़ चोरी से लाखों चढ़ा जाते हैं।” भगवान के मुख से यह सब कहलवा कर व्यंग्यकार धर्म और बाज़ार के गठजोड़ को अपने निशाने पर लेता है। वर्तमान परिदृश्य पर यदि दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट है की बाज़ार ने सारी मानवीय और सामाजिक गतिविधियों, आस्थाओं और विश्वासों पर कब्ज़ा कर लिया है। मंदिर और मूर्तियाँ जब पत्थर और मिट्टी की थी, तो आस्था सोने की थी, बाईस कैरट शुद्ध थी; किन्तु अब जब भगवान के घर सोने से बन रहे हैं तो आस्था बाज़ार की बलि चढ़ गई है। 

मानवीयता और मानवीय व्यवस्थाओं में विश्वास की खोज करते-करते गौतम घर की दहलीज़ पर भी ठिठक जाते हैं। “वफ़ादारी का हलफ़नामा” नामक व्यंग्य में व्यंग्य का भोक्ता अथवा वाचक पत्नी द्वारा ड्राफ़्ट किए गए हलफ़नामे की भाषा पर आश्चर्य-चकित है। भाषा का नमूना देखिए– “मैं मंशा राम पुत्र श्री हेमराम मकान न. चार सौ बीस, मीट मार्किट अपने पूरे होशो-हवास में वफ़ादारी के हलफ़नामे पर बिना किसी के दबाव के सारी शर्तों को पढ़ अपनी ख़ुशी से अपने खुदा को हाजिर नाजिर मान हलफ़नामे पर दस्तख़त करता हूँ कि मैं घर की मुखिया राजरानी, पुत्री श्रीमती कमला देवी की देख रेख में चल रहे घर की असली मुखिया राजरानी के प्रति वफ़ादारी की मन से क़सम खाता हूँ। राजरानी का इकलौता पति होने के चलते भी मैं किसी और की तरफ़ आँख उठाकर तो दूर, कान तक उठाकर नहीं देखूँगा और अपनी बीवी के किसी भी फ़ैसले पर मरने के बाद भी असहमति नहीं जताऊँगा।” पति ग़ुस्सा भी होता है, अचंभित भी और तर्क भी देता है– “पर ये हलफ़नामा तो उनके लिए है जिन पर मरने के बाद भी विश्वास नहीं कर सकते। ये राजनीतिक हलफ़नामा है और हम विशुद्ध गृहस्थी हैं। हम तो विवाह के वक़्त फेरे लेते हुए अग्नि को साक्षी मान पहले ही वफ़ादारी की क़समें खा चुके हैं। ऐसे में इस काग़ज़ के पुर्ज़े की क्या ज़रूरत ?” किन्तु स्त्री-हठ राज-हठ से भी प्रबल है– “समझते क्यों नहीं! इस हलफ़नामे का मकसद तुम्हारे प्रति कोई कार्रवाई करना नहीं है। सच कहूँ तो मुझे तुम पे अपने से भी अधिक भरोसा है। ....... इससे और कुछ नहीं होगा, बस, मेरे प्रति तुम्हारी वफ़ादारी का लिखित पता चलेगा और में सबके सामने तुम्हारे हलफ़नामे को बताते सर ऊँचा किए कह सकूँगी कि.....” अब इस दिखावे से विश्वास कहाँ लौटेगा? भाव यही कि आज सामाजिक स्तर पर अविश्वास का वातावरण है और इसका कारण है, हमारा नैतिक पतन; और यह विश्वास किसी हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करने से नहीं लौटाया जा सकता। 

इधर लेखकीय प्रतिबद्धता और पक्षधरता अथवा लेखकीय सरोकार को लेकर भी व्यंग्यकार मुखर है और हर संग्रह में एक-दो व्यंग्य इस हेतु संबोधित होते हैं। इस संग्रह में ‘मुख्यधारा का व्यस्त कवि’ नामक रचना में अशोक गौतम ने इंगित किया है कि सरकार के गुणगान ही नहीं बल्कि चुनाव के लिए नारे लिखने तक में आगे रहने वाले कवि ही देर-सवेर पुरस्कार व प्रशस्ति पाते हैं। किन्तु व्यंग्यकार का मुख्य सरोकार प्रशस्ति पुरस्कार नहीं बल्कि लेखकीय सरोकार है अर्थात् लेखक चारण-छाया से बाहर नहीं निकलेगा तो फिर राजनीतिज्ञों को कोसने का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता और शायद लिखने का भी नहीं। 

कुल मिलाकर एक साधारण पाठक के रूप में मुझे तो यह भी लगता है कि व्यंग्य कहीं न कहीं कहने का कौशल ही है और यह कौशल गौतम को सहज प्राप्त है; घुट्टी में प्राप्त है ऐसा तो दावे से नहीं कहा जा सकता, किन्तु पिछले 25-30 वर्ष के अपने लेखन अनुभव में उन्होंने शब्द-ब्रह्म रूपी चन्दन को ऐसे घिसा है कि अब उनके हाथ ही नहीं पूरा अस्तित्व उसकी ख़ुशबू से लबरेज़ है। समीक्ष्य-संग्रह से दो-एक उदाहरण इसकी पुष्टि करेंगे। ‘फ्री स्टाइल नियम’ नामक व्यंग्य में वे कहते हैं—“मुए एटीएम इन दिनों किसी ज़मींदार से कम नहीं। हरदम मूछें खड़ी किए सबको डराए रखते हैं। .... मुए घंटों लाइन में खड़ा रखते हैं, अपने आगे पीछे जनता कि पूछें नचवाते, नखरे दिखाते। उसके बाद हाथ में दो हज़ार ऐसे थमाते हैं मानों अपना कमाया नहीं, इनसे उधार ले रहे हों।” इसी व्यंग्य में वे कहते हैं— “बाज़ार के मुख्य शहीदी गेट पर गाय गली-सड़ी सब्जी के ढेर पर ऐसे डटी थी, स्वच्छता मिशन की सक्रिय सदस्या होकर। अगर बाज़ारों में ये आवारा ढोर-डंगर न हों तो बाज़ार दूसरे दिन को नरक हो जाएँ। सरकार को चाहिए कि वे इन्हें अपने सफाई मिशन का ब्रांड घोषित करें। इन्हें पुरस्कृत करें।” ‘दो लाख निकालूँगा’ नामक एक और व्यंग्य में वे कहते हैं—“आज फिर नए नोटों का दीदार करने के लिए मन में बेकरारी, खुमारी लिए आड़ी तिरछी लाइन में लगा था। मेरे आगे होरी। पीछे गोबर। दाएँ-बाएँ और भी प्रेमचंद के मर चुके ज़िन्दा किरदार। अँधेरा होने लगा। एटीएम के नोट ख़त्म हो गए पर लाइन ख़त्म न हुईं ......” आदि आदि। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस व्यंग्य-संग्रह में व्यंग्यकार की अभिव्यक्ति और भाषा-शैली में एक अलग ही प्रवाह, ताज़गी, चुभन, चुहल, लाक्षणिकता, व्यंजकता और सूक्तिमयता विद्यमान है। 

राजेन्द्र वर्मा 
“श्यामकला” ग्राम : कठार, पत्रालय : बसाल, तहसील व जिला सोलन, हि.प्र. 173213        

 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

पुस्तक समीक्षा

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं