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युवाओं की लाचारगी का यथार्थ चित्रण 


समीक्षित कृति: यारबाज़ (लघु उपन्यास)
लेखक: विक्रम सिंह  
प्रकाशक: लोकोदय प्रकाशन  प्रा.लि., 65/44, शंकर पुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ - 226001
आईएसबीएन नंबर: 978-93-88839-57-0
मूल्य: 175 रु.

हाल ही के वर्षों में विक्रम सिंह ने हिंदी कहानी लेखन में अपनी पहचान बनाई है। विक्रम सिंह की कई कहानियाँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। “यारबाज़” विक्रम सिंह का पहला उपन्यास है, इन दिनों काफ़ी चर्चा में है। इनका कहानी संग्रह “और कितने टुकड़े” भी काफ़ी चर्चित रहा था। लेखक का एक और उपन्यास “अपना खून" प्रकाशित हो चुका है। विक्रम सिंह एक युवा और  संवेदनशील कथाकार हैं। “यारबाज़” उपन्यास की विषयवस्तु नवीन धरातल का अहसास कराती है। उपन्यास का मुख्य किरदार श्यामलाल यादव है, उपन्यास का ताना-बाना इसी श्यामलाल यादव के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस कृति में उपन्यास और संस्मरण का मिश्रण है। इसका सधा हुआ कथानक, सरल-स्पष्ट भाषा, चरित्र चित्रण व पात्रों के आपस की बारीक़ियाँ, पात्रों का रहन-सहन, व्यवहार, उनकी स्वाभाविकता, सामाजिक, आर्थिक स्थिति आदि बिंदुओं, क़स्बाई-ग्रामीण पृष्ठभूमि इसे बेहद उम्दा उपन्यास बनाती है। उपन्यास की कथा बहुत ही रोचक व संवेदनशील है। कथाकार ने किरदारों के माध्यम से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था, जातिवादी सामाजिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार और गाँव व क़स्बों की राजनीति का विस्तृत ख़ुलासा करते हुए समाज को आईना दिखाया है। 

कथानक का प्रारंभ इस तरह होता है कि कथा का नैरेटर राजेश अपने लंगोटिया यार श्यामलाल यादव से मिलने उसके गाँव मऊ जाता है। लेकिन श्याम से मिलकर राजेश को विश्वास नहीं होता है कि यह वही श्याम है जो क्रिकेट के प्रति पूरा जुनून रखता था? क्या वही श्याम है जो मैथेमेटिक्स के बड़े से बड़े सवाल हल कर दिया करता था? श्याम मऊ में खेती-बाड़ी सँभालते हुए कॉलेज की राजनीति से जुड़कर कॉलेज के अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर एक दिन अपने क्षेत्र का एमएलए बन जाता है। दूसरी ओर राजेश बी.ए. प्रथम श्रेणी में पास करता है और फिर एम.ए. भी करता है लेकिन नौकरी के लिए दर-दर भटकता रहता है। एक दिन श्याम का पत्र राजेश को मिलता है जिसमें श्याम लिखता है कि मैं राज्यसभा का सदस्य बन गया हूँ। क्या तुम मेरा सेक्रेटरी बनना पसंद करोगे? विक्रम सिंह ने इस उपन्यास की कहानी को इस तरह ढाला है कि वह पाठक को अपने रौ में बहाकर ले जाते हैं। इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप श्यामलाल यादव, राजेश, राकेश, मिथिलेश्वर चाचा, नंदलाल, पलटन यादव, अनीता देवी, बबनी, अमरनाथ, राधिका, इत्यादि किरदारों से जुड़ जाते हैं। लेखक ने पात्रों का चरित्रांकन स्वाभाविक रूप से किया है। कथाकार ने किरदारों को पूर्ण स्वतंत्रता दी है।

विक्रम सिंह ने स्थानीय संस्कृतियों, सभ्यताओं और विभिन्न सामाजिक संरचनाओं को बड़ी सूक्ष्मता से चित्रित किया है। श्यामलाल यादव का व्यक्तित्व कमाल का है। श्यामलाल यादव का पहनावा, बोलचाल, क्रिकेट का जुनून, मित्रों की चिंता, समाज के प्रति विचार से लेकर बिंदास अंदाज़ पाठकों को प्रभावित करता है। श्यामलाल यादव का चरित्र आत्मीय प्रेम और संवेदनात्मक धरातल पर चित्रित हुआ है। युवाओं की बिंदास भाषा, उनकी जीवन शैली और ग्रामीण लोगों की भावनाओं का तालमेल अंतस को छू गया। लेखक ने इस कृति में जीवन के यथार्थ को परत-दर-परत उधेड़ते हुए जीवन के गहरे मनोभावों को पात्रों के माध्यम से अधिकाधिक रूप से व्यक्त किया है। कथाकार ने युवा लडकियों की लाचारगी को यथार्थ रूप से चित्रित किया है।

"मैं तुम्हें पहले ही बता चुकी हूँ पापा ने मुझे आगे पढ़ने से मना कर दिया है वे शादी के लिए सरकारी नौकरी वाला लड़का ढूँढ रहे हैं और तुम भी नौकरी ढूँढ लो और मुझे ले चलो क्योंकि बेरोज़गार लड़के से प्रेम करना आसान है, ब्याह करना बहुत मुश्किल। प्रेम करते वक़्त हम किसी पार्क में बिना खाए-पिए कुछ पल बिता सकते हैं पर ब्याह के बाद ता-उम्र नहीं। ब्याह के बाद वंश बढ़ता है। वंश बढ़ाने के लिए भी आर्थिक मज़बूती होनी चाहिए। सबसे बड़ी बात जब लड़की माँ बाप के ख़िलाफ़ विवाह करती है तो उस समय लड़के का पैरों पर खड़ा होना भी और ज़रूरी हो जाता है। ताकि बाद में कभी लड़की के पिता को यह न कहना पड़े कि हमने तो पहले ही समझाया था। फिर ग़ैर बिरादरी की लड़की से शादी करने के बाद तुम अपने पिता पर भी आश्रित नहीं रह सकते। मुझे विश्वास है तुम नौकरी लेने में कामयाब होगे।” (पृष्ठ 90)

विक्रम सिंह ने इस लघु उपन्यास में सहजता से समाज का यथार्थ सामने रखा है। 
"कभी जीवन में आप अपनी सोच से चलते हैं और कभी जीवन अपनी सोच से आपको चलाता है।” (पृष्ठ 18) 

“भविष्य कुछ नहीं होता है जो होता है वह सब वर्तमान होता है। कुछ लोग सब काम भविष्य को सोचकर करते हैं। मैं भविष्य के लिए नहीं वर्तमान के लिए सब कुछ करता हूँ। कुछ लोग खूब पढ़ते हैं यह सोचकर कि भविष्य में अच्छी नौकरी मिल जाएँगी। मगर भविष्य में नौकरी मिल ही जाएगी ऐसा संभव नहीं है। भविष्य में कुछ पाना है तो बस वर्तमान अपना सही रखो, वर्तमान जितना अच्छा रखते जाओगे भविष्य अपने आप से सुधरता जाएगा।” (पृष्ठ 27)

दुनिया का बड़ा अजीब दस्तूर होता है हर एक इंसान दूसरे की बहन से तो प्यार करना चाहता है पर अपनी बहन को दूसरे से प्यार करता हुआ देखना नहीं चाहता। (पृष्ठ 81)  

सच यह लोकतंत्र का कमाल है जहाँ पर अनपढ़ मंत्री शिक्षा मंत्री बन जाता है। अच्छा हुआ जो नंदलाल पढ़ाई ना कर ट्रकों के बिजनेस में लग गया, श्याम राजनीति में आकर अपने मुकाम पर है नहीं तो मेरी तरह पढ़ लिख कर फ़ाइल लेकर इंटरव्यू के लिए चक्कर लगा रहा होता अथवा कहीं अफसर बनकर प्रमोशन के लिए ऐसे नेताओं के लिए खैनी बना रहा होता या उसके जूते के तस्मे बाँध रहा होता। (पृष्ठ 112)  

उपन्यास के शुरुआत में चरित्रों और परिवेश को समझने में कुछ समय लगता है परन्तु धीरे-धीरे उपन्यास पाठक को अपने साथ बाँधता चला जाता है। विक्रम सिंह ने अनुभवजन्य भावों को सार्थकता के साथ चित्रित किया है। कथाकार ने इस उपन्यास को इतने बेहतरीन तरीक़े से लिखा है कि इस उपन्यास को पढ़ने वाले की उत्सुकता बराबर बनी रहती है, वह चाहकर भी उपन्यास को बीच में नहीं छोड़ सकता। उपन्यास की कहानी में प्रवाह है, अंत तक रोचकता बनी रहती है। इस उपन्यास में गहराई, रोचकता और पठनीयता सभी कुछ हैं। विक्रम सिंह एक सशक्त और रोचक उपन्यास रचने के लिए बधाई के पात्र हैं।

दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी: deepakgirkar2016@gmail.com

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