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अटल निश्चय

 

जीवन भर जिन बच्चों के लिए नमिता संघर्ष करती रही, उन बच्चों के व्यवहार से इतनी उपेक्षा मिली कि नमिता ने अपनी ममता के ख़िलाफ़ जाकर उन्हें त्याग दिया और आहत होकर एक कठोर फ़ैसला ले लिया। 

नमिता ने काँपते हाथों से घर का ताला खोला और अंदर गई। भँवर में फँसी नाव की तरह विचारों की नाव में डोलती वह कुर्सी पर बैठ गई। आज उसका शरीर और मन थक कर चूर हो चुका था। बरामदे की मुँडेर पर जाती हुई धूप की किरणें मस्त हवा के साथ गुफ़्तुगू कर रही थीं। प्रकृति की रम्यता नमिता को हमेशा ही सुकून देती रही है। पर आज नमिता का मन और शरीर मानव विडम्बनाओं के झंझावात पर उलझ गया था। 

आज वह सोचती है कि मनुष्य जीवन भर किस तरह झूठे रिश्ते-नातों, मान–अपमान के बीच झूलता रहता है। वह क्यों नहीं समय रहते इस संसार की नश्वरता को समझता है? इस घर को देख कर लग रहा है कि क्या है हमारे हाथ में-जब सब कुछ भगवान की इच्छा से होता है तो क्यों हम इच्छा करते हैं, क्यों सोचते हैं? पर शायद यही माया मोह है, जो मानव के मन पर अंकुश रखता है। 

आज इस घर में आकर नमिता एक बार फिर अपने अतीत में खो गई। मन बड़ा चंचल होता है, यह हमारे जीवन का अतीत दिखाता रहता है, भविष्य के हसीन सपने बुनता रहता है और वर्तमान को भोगता रहता है। मन को अपने वश में रखना आम मानव के वश में नहीं है और नमिता विचारों की गुफा में प्रवेश करती है। 

नमिता अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थी। उसका बचपन  माँ-बाप की ममता भरी छाँव में बीत रहा था। मांँ के साथ उसका वही रिश्ता था जो फूल का ख़ुश्बू से और चाँद का चाँदनी से होता है। मध्यमवर्गीय परिवार के सभी सुख उसे प्राप्त थे। उसके घर में एक कमरा उसके लिए भी था जिसमें उसके कपड़े, किताबें, खिलौने सजे थे। 

नमिता सुख की छाँव में हिलौरे ले रही थी, सब कुछ सुखमय था पर काल की क्रूरता को यह सुख नहीं देखा गया। एक दिन उसके माता पिता बुआ की शादी से आ रहे थे। रास्ते में रेल दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। 

पर हाय रे दुर्भाग्य! परीक्षा होने के कारण नमिता वहीं अपनी चाची के पास ही रह रही थी। दस साल की छोटी सी उम्र की यह दुर्घटना उसके जीवन की दिशा को बदलने के लिए काफ़ी थी। नमिता की दुनिया ही बदल गई। उसका पालन पोषण करने के लिए उसके चाचा का परिवार किराये का घर छोड़कर नमिता के घर में आ गये। 

शुरू में तो सब ठीक रहा, पर धीरे-धीरे नमिता की चीज़ें, खिलौने छिनने लगे और देखते ही देखते उसके प्यारे से कमरे पर दूसरों का अधिकार हो गया। 

उसकी चाची उससे सारा काम करवाती और वहीं बरामदे में एक चारपाई पर वह थककर सो जाती। उसकी ज़िन्दगी एक नौकरानी की तरह हो गई। 

समय धीरे-धीरे बीतने लगा। उसकी ज़िन्दगी रेत के समान फिसल रही थी। नमिता सोचती—‘जब शादी होगी तो अपने पति के घर में जो सिर्फ़ उसका घर होगा, अपनी सारी हसरतें पूरी करेगी।’ 

एक दिन चाचा ने एक ग़रीब क्लर्क के साथ साधारण तरीक़े से उसका विवाह कर दिया। ससुराल में अपनी हसरतों की पूँजी लेकर नमिता पहुँची, तो अपने दमे-सी हाँफती ज़िन्दगी में एक और वास्तविकता का सामना उसे हुआ। यह वास्तविकता थी कि उसको अपने पति अमित की दो बहनों और एक भाई का जीवन सँवारना था। ख़ैर इसे अपनी नियति मानकर नमिता ने इसे पूरा करने का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। 

किराये के छोटे से मकान में पति पत्नी, दो ननदें और देवर के साथ रहते हुए, उसका अपना घर एक सराय बन गया था। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाया। ख़ुद एक युवती होने पर भी दो ननदों व एक देवर को बच्चों के समान सीने से लगा कर पाला और जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित किया। समय आने पर अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन को सँवारा। 

जीवन की इस आपाघापी में अपने घर का हसीन सपना कहीं अतीत के गर्त में दब गया। वह इस हसरत को कहीं इतनी दूर दबा चुकी थी कि उसे शायद ही कभी इस सपने की याद आई। 

धीरे-धीरे ननदों और देवर को निभाते हुए उसने चैन की साँस ली तो उसके दोनों लड़के जवानी की दहलीज़ पर पाँव रखे थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई और शादी करते-करते नमिता बिल्कुल ख़ाली हो चुकी थी—धड़ और शरीर दोनों चुक गये थे। 

एक क्लर्क की इतनी आमदनी कहाँ हो पाती कि वह इन सारी ज़िम्मेदारियों के साथ मकान की सोच पाता। उसे लगा उसका सपना—सपना ही रह जायेगा। 

पर तभी गाँव से उसके चचिया ससुर का फोन आया कि ‘गाँव की ज़मीन बिक रही है, अमित तुम आकर अपना हिस्सा ले जाओ।’ सुनकर नमिता के सपने फिर से अंगड़ाई लेने लगे। उसने साहस करके कुछ उधार लेकर दो बड़े कमरों वाला मकान ख़रीद लिया। इस हसरत को पूरी करने के लिए लोन भी लिया। 

उसने साधारण पूजा करके मकान का गृह-प्रवेश किया। सोचा जब लोन उतर जायेगा और पैसा होगा तो एक अच्छी-सी पार्टी भी दे देगी, वह अपने पति अमित के साथ वहाँ रह रही थी और पैसा बचा-बचा कर लोन उतार रही थी, सोचा जब लोन उतर जायेगा तो चैन से अपने मकान में इच्छित जीवन जियेगी। 

पर तभी उसके बड़े लड़के का स्थानान्तरण इसी शहर में हो गया और एक बेडरूम बेटे ने ले लिया। ख़ैर—दो कमरे थे इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई। वह धीरे-धीरे पैसा इकट्ठा करती और लोन की किश्त चुका देती। वह ख़ुश हो जाती कि लोन उतर जाने पर वह अपने घर को सुन्दर पर्दों, गमलों और सजावटी सामान से अलंकृत करेगी। 

एक-दो बार बेटे से पैसों का ज़िक्र किया तो सीधा उत्तर था कि ‘हम अपने खाने का ख़र्च देते तो हैं, मकान की ज़िम्मेदारी आपकी है। क्योंकि यह आपका शौक़ है।’ वह निरुत्तर हो जाती। 

इस तरह समय पंख लगाकर उड़ रहा था। उसकी अवस्था भी बढ़ रही थी। उसके शरीर में इतनी ताक़त नहीं थी कि वह अधिक काम कर सके पर फिर भी घर का सारा काम करना होता था क्योंकि बहू गर्भवती थी और बेटे का आदेश था कि डॉक्टरों ने उसे आराम करने को कहा है। इसलिए उसे किसी तरह का तनाव या काम नहीं देना है। विचारी नमिता की ज़िन्दगी काँपती थरथराती दिये की लौ की तरह क्षीणकाय हो रही थी। 

इसी भागम-भाग में ज़िन्दगी बीत रही थी कि अचानक नमिता के पति अमित को दिल का दौरा पड़ा। पति के हार्ट अटैक में नमिता ने सभी देवी-देवताओं, पीरों, गुरुओं से दुआ माँगी, रात–दिन एक कर दिया। पर क्रूर विधाता उस पर अट्टहास कर रहा था। नमिता की मेहनत पराजित हो गई। ज़िन्दगी हार गई और मौत जीत गई। एक सन्नाटा उसके जीवन में रस्सी की तरह तन गया। 

चौथी अवस्था में पति का वियोग क्या होता है, यह कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है। वह टूट गई। अकेलेपन से त्रस्त नमिता जब सोने जाती तो अमित की यादें आकाश में उड़ती पतंगों की तरह उसके मन मस्तिष्क में घूमती रहती थीं। 

पिता के संस्कार में छोटा बेटा आया और अपने परिवार को वहीं छोड़ गया। छह माह के भीतर ही छोटे बेटे ने अपना तबादला यहीं करा लिया। अब घर के काम, ख़र्चों में रोज़ झगड़ा व तनाव होने लगा। दोनों बहुएँ एक हो जातीं और सास को दोष देने लगतीं। लड़के भी अपनी माँ को डाँट देते थे। 
नमिता सोचती-आज अपने ही घर में अपने ही बच्चों के बीच वह पराई हो गई है। वह शून्य में ताकती रहती और अमित को याद कर-करके रोती रहती। नमिता अतीत की यादों से भरी गगरी को दिमाग़ से उतारना चाहती थी, पर यह स्मृतियाँ उसके दिल और दिमाग़ में हमेशा मौजूद रहती। 

छोटे बेटे ने आकर माँ का दरवाज़ा खटखटाया। “कौन है?” नमिता ने पूछा। 

“मैं तुम्हारा लाड़ला बेटा,” छोटे बेटे आनन्द ने जवाब दिया। 

दरवाज़ा खोलते हुए नमिता का मन ख़ुशी से भरा था कि चलो देर से सही बेटे को माँ की सुध तो आई। 

“कहो बेटा! कैसे आना हुआ?”

“माँ! दरअसल रोज़ ड्रांइग रूम में बिस्तर लगाने फिर उठाने में बहुत समय और श्रम लगता है। आप अपना वाला कमरा हमें दे दो, आप तो अकेले हैं। लॉबी के एक कोने में ही सो जाया करेंगी।”

“क्या . . .?” सुनकर नमिता की धमनियाँ काँपने लगी। उसका चेहरा सफ़ेद कपड़े की तरह हो गया। 
“ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?” नमिता ने पूछा। 

“हॉं माँ मैं तो परिवार की बहू को इज़्ज़त देने को कह रहा हूँ,” आनन्द ने आँख नचाते हुए कहा। 

“वह कमरा मेरा है, उसमें मेरी और तेरे पापा की यादें बिखरी हैं, मैं किसी भी क़ीमत में वह कमरा नहीं दूँगी,” नमिता ने निर्णयात्मक लहजे में कहा। 

आनन्द सिर झुकाकर चला गया पर माँ को गहरी उदासी व पीड़ा की चादर दे गया। 

इस तरह तनाव में दिन व्यतीत हो रहे थे। बहुएँ और बेटे एक तरफ़ और नमिता अकेले ज़िन्दगी काट रही थी। इस तरह एक साल बीत गया। पिता के श्राद्ध के बाद बड़ा बेटा नमिता के पास आया और बोला, “माँ, आप जीते जी इस मकान का बँटवारा कर दो कहीं ऐसा न हो कि आपके जाने के बाद हम लोगों में झगड़ा हो।”

“बँटवारा . . . मैं क्यों बँटवारा करूॅं? किसलिए करूॅं?” नमिता ने आहत होकर पूछा। 

“क्योंकि पिता की सम्पत्ति में हम बच्चों का भी हक़ है,” बड़े बेटे ने कहा। 

“हक़! सिर्फ़ लेने का हक़ है। पिता की मदद करने का हक़ नहीं था। जब हमने एक-एक पैसा जोड़कर उधार उतारा, तो तुम लोग कहाँ थे. . .? तब यह प्यार, यह हक़ कहाँ था? यह मेरे सपनों का घरौंदा है, इसे मैंने मेहनत से, रक्त से सींचा है। मैं इसका बँटवारा कभी नहीं करूँगी।

“तुमको शायद पता नहीं कि यह मकान मेरे नाम है और अपने जीते जी मैं इसे नहीं बाँटूँगी,” कहती हुई नमिता दुःख से हाँफने लगी और अपने कमरे में चली गई। 

इस घटना के बाद नमिता को सभी रिश्तों से नफ़रत हो गई। यह वही बच्चे हैं, जिनके पालन-पोषण के लिए उसने अपने सारे अरमानों का गला घोंट दिया। अमित और वह तो आराम से रह सकते थे, पर बच्चों को अफ़सर बनाने के लिए उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर अच्छे स्कूल में पढ़ाया-लिखाया। आज यह मेरे घरौंदे का बँटवारा करना चाहते हैं। नमिता क्षितिज के पार देखने लगी। 

इस घटना के बाद उसकी बहुएँ नमिता को और प्रताड़ित करतीं। वह घर के एक कोने में अकेले पड़ी रहती। कोई उससे बात नहीं करता। पोते-पोती को भी उसके पास नहीं जाने दिया जाता, जैसेे वह कोई अछूत हो। नमिता का हृदय इनके व्यवहार से दुःखी हो जाता। कभी सोचती कहीं किसी आश्रम में चली जाऊँ। पर दूसरे ही क्षण उसके मन में आता कि क्यों पलायन करूँ? मैं इस घर को नहीं छोड़ूँगी। इसमें अमित और मेरे सपनों का घरौंदा बसा है। अमित की ख़ून पसीने की कमाई का पैसा लगा है। 

बेटों का कहना था कि वह ऊपर एक सेट बना देंगे और आराम से माँ ऊपर अलग रह सकती हैं। 

पर नमिता ने सोचा कि उसने और अमित ने कितने चाव से बच्चों को पाला, उनके हर सुख के लिए सहस्त्रों दुखों को सहा, पर आज वही बच्चे उसी के घर में अलग रहने की बात कर रहे हैं। इससे तो ग़ैर भले होते हैं। जिनके लिए हमने कभी कुछ किया नहीं होता, जिनसे हमारी कोई उम्मीद नहीं होती फिर भी वक़्त आने पर मदद तो करते हैं। 

पर अपने बच्चे जो हमारे शरीर का एक हिस्सा होते हैं, जिन्हें ख़ून से सींच कर हम फूल बनाते हैं, उनको अफ़सर बनाकर हम ख़ुद को धन्य समझते हैं, उन बच्चों से ग़ैरों जैसी बात सुनकर कोई कैसे स्थिर रह सकता है। 

यही सोचते-सोचते नमिता सोचने लगी कि वह कैसे इस नश्वर संसार से, माया मोह से, बेटों की ममता से ख़ुद को आज़ाद करेगी। वह सोचने लगी कि जीवन में कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे जाने के बाद भी अपना नाम रहे और हमारे द्वारा किये काम से समाज लाभान्वित हो। यह औलाद तो जीते जी सामने रहने पर हमको आदर नहीं दे पाती है। वह हमारेे जाने के बाद आपको क्या याद करेगी। 
अतः मेरी पूँजी और शक्ति जो बची है, उसे किसी परोपकारी काम में क्यों न लगाऊँ? क्यों न कोई अनाथाश्रम, विकलांग गृह या वृद्धाश्रम खोलूँ जिससे दुर्बल व्यक्तियों को आश्रय मिले। इसी उधेड़बुन में उसने एक महान फ़ैसला ले लिया कि वह अपना सारा जीवन वृद्ध लोगों की सेवा में लगायेगी और उस घर को जो उसकी और अमित की आशाओं और सपनों का केन्द्र है, उसे वृद्धाश्रम बनायेगी, जिससे उन वृद्धों को आश्रय दे सके, जो अपनी औलादों द्वारा बहिष्कृत होकर दर-दर की ठोकरें खाते हैं। 

इस फ़ैसले को कई बार मन में दोहराकर उसने ख़ुद को सारे माया जाल से मुक्त किया और अपने बेटों को, बहुओं को बुलाकर अपना फ़ैसला सुनाया। फ़ैसला सुनकर परिवार के लोग सन्न रह गये। 

पहले तो सबने माँ को प्यार से समझाया, अपनी ममता की दुहाई दी, पर जब नमिता नहीं मानी तो वह अपने असली रूप में आ गये और सबने नमिता को खरी-खोटी सुनाई। पर नमिता ने स्पष्ट कह दिया कि वह अपना मकान ख़ाली चाहती है, आप लोग अपना इंतज़ाम कहीं और कर लें। 

तीन-चार महीनों में दोनों लड़कों ने अपना स्थानान्तरण दूसरे शहरों में करा लिया और नाराज़ होकर चले गये। 

नमिता ने एक स्वयं सेवी संस्था से अपील की कि आश्रम खोलने में उसकी मदद करें। आज इस काम को काग़ज़ी तौर पर वह कर चुकी थी और अभी स्वयं सेवी संस्था के लोग आकर यहाँ वृद्धाश्रम का काम आरम्भ करने वाले हैं। 

वह एक बार अपने हसरतों के घर को देखती है। अमित को याद करती है। अमित और उसके यहाँ कितने सुखद पल व्यतीत किये हैं। आह! काश अमित आज उसके साथ यहाँ होते, तो उसे कितना सहारा मिलता। सारी ज़िन्दगी ज़िम्मेदारी निर्वाह करते रहे। अमित और मैंने कभी एक पल भी ख़ुशी का नहीं बिताया। आज हमारा वक़्त सिर्फ़ हम दोनों के लिए ही है पर विधाता की लीला देखो उसने अमित को मुझसे छीन लिया—और नमिता की आँखों में आँसू काँपने लगे। अपने को नमिता ने संयत किया। अमित मैं नहीं जानती कि मैं क्या कर रही हूँ पर जो कर रही हूँ ठीक ही होगा और तुम इससे ख़ुश होगे। मेरा हौसला बढ़ाते रहना अमित . . . 

नमिता अभी अतीत और वर्तमान के झूले में ही झूल रही थी कि बरामदे में क़दमों की आहट हुई जिससे नमिता की तन्द्रा टूटी। देखा आश्रम की शुरूआत के लिए फूल मालाएँ लेकर संस्था के लोग मौजूद थे। एक लम्बी साँस लेकर नमिता उनके स्वागत के लिए उठ गई। इस संसार की कठोरता और असारता वह भोग चुकी थी इसलिए उसने किसी तरह की वेदना महसूस नहीं की। 

नमिता ने सामने लिखे बोर्ड पर निगाह डाली “अमित वृद्धाश्रम” और अमित को याद करके नमिता की आँखों से अश्रुधारा बह चली और सामने के शब्द धुँधले से हो चले। 

लॉन की धूप कलिमा में ओझल हो गई थी। झीगुरों का हल्का स्वर कभी-कभी सुनाई दे रहा था। वृक्षों की परछाइयाँ गहराती जा रही थी। आसमान पर चाँद अपनी यात्रा शुरू कर चुका था। नमिता और अमित के सपनो का महल एक बेसहारों और बेघरों का घर बनने जा रहा था। 

इस विशेषांक में

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