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तोते वाला कबाड़ी

 

लंबी धूसर दाढ़ी, मेंहदी से रँगे लाल बाल, चौड़ी पेशानी पर उतरती कुछ घुँघराली लटें, बड़ी-बड़ी आँखें और नीचे को झुकी तोतई नाक। उजला रंग और उजले ही कपड़े पहने यही थे रहमान कबाड़ीवाले। ठीक नौ बजे वे घर से हाथठेला लेकर निकल जाते और ‘कबाड़ दे दो, कबाड़’ की आवाज़ लगाते हुए गलियों में चल पड़ते। गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात, रहमान का यह रोज़ का नियम बन चुका था। पूरा शहर तो नापा नहीं जाता था, पर रोज़ तीन-चार कॉलोनियों में फेरी लगा ही लेते थे। आसपास के बच्चे नौ बजे घर से बाहर निकलकर रहमान के ठेले का इंतज़ार करते थे। इसलिए नहीं कि वे कबाड़ बेचना चाहते थे, वरन फेमू को देखना चाहते थे, उससे दुआ-सलाम करना चाहते थे। ‘फेमू’ भी बच्चों की चंचलता देखकर फुदकने लगता। बच्चे उसे गली के आखिरी छोर तक छोड़ते, फिर वह रहमान के साथ निकल पड़ता।

रहमान नौ से दो बजे तक तीन कॉलोनियों की फेरी लगा लेते। तीन बजे कहीं छाँह में ठहरकर साथ लाई रोटी खाकर आराम करते। फेमू भी खाने में हिस्सा बाँटता। जो-जो रहमान खाते, वही सब उसे चाहिए होता। यह फेमू गोल-गोल चमकीली आँखों वाला तोता था, रहमान का प्यारा-दुलारा। ठेले के बीच में उसका साफ-सुथरा पिंजरा टँगा रहता। कभी उसमें लगे झूले में झूलता, तो कभी रहमान की तरह आवाज़ लगाने की कोशिश करता. . . ‘कबाड़ ले लो. . . कबाड़’। सब उन्हें ‘तोते वाला कबाड़ी’ कहते। तोता ही उनकी पहचान बन गया था।

शाम पाँच बजते ही रहमान घर की ओर लौटते। घर से दो फर्लांग पहले बंबई बाज़ार चौराहे के पास सलीम चायवाले की दुकान पर ठेला रोकना उनका रोज़ का नियम था। उनके मिलने-जुलने वाले यार-दोस्त भी यहीं आकर उनसे मिल लेते। सुख-दुख की, ज़माने की तमाम बातें कहने-सुनने का उनका यही अड्डा था। चायवाला फटाफट चाय तैयार कर रहमान को बड़े गिलास में चाय और दो टोस्ट पकड़ा देता। दोस्त होते तो उन्हें कट थमा देते। रहमान फेमू के पिंजरे का पल्ला खोलते, फेमू झट से निकलकर उनके कंधे पर बैठ जाता और ‘चा. . . चा’ बोलने लगता। उसे चाय पीने की बहुत जल्दी होती। रहमान उसकी कटोरी में थोड़ी चाय डालते और टोस्ट का आधा टुकड़ा पकड़ा देते। रहमान की देखा-देखी फेमू भी चाय के साथ टोस्ट खाने लगता। चाय पीते इस तोते को देखने की उत्सुकता में राह चलते लोग रुक जाते। यह अनोखा तोता था। अब तक किसी ने इस तरह चाय पीते तोते को नहीं देखा था। चाय ख़त्म करते ही फेमू बोलता भी, “चाचा, चा ख़त्म हो गई. . . चओ. . . चओ. . .” रहमान तोते के सिर पर हाथ फेरते, “हाँ! हाँ! बेटा फेमू, चलते हैं। ज़रा दम तो लेने दे।” फेमू इधर-उधर देखता हुआ रहमान के कंधे पर बैठ जाता। रहमान के सभी दोस्तों को वह जानता था। उनसे दुआ-सलाम भी करता, उनकी बातों में बीच-बीच में टोका भी देता। शाम छह-साढ़े छह बजे तक रहमान और फेमू घर पहुँच जाते।

घर आकर रहमान फेमू के पिंजरे को दालान में टाँग देते। फेमू को वहाँ टँगा रहना बहुत अखरता, पर क्या करे? चाची शाम या रात को उसे इतनी आज़ादी कहाँ देतीं कि वह पूरे घर में फुदकता रहे। फिर बिल्ली भी इस फिराक में रहती कि कब फेमू पकड़ में आए। चाची दिनभर घर पर अकेली रहतीं। रहमान के आते ही उनका बोलना शुरू हो जाता। दोनों बहुओं ने अपना घर अलग कर लिया था। कभी-कभी बेटे लच्छू-अच्छू हालचाल पूछने आ जाते। दोनों लोगों और बकरियों का काम करते-करते चाची का पूरा दिन निकल जाता। थुलथुल काया ज़रा जल्दी ही थक जाती। वैसे चाची दिल की अच्छी थीं। भले ही वे फेमू को पिंजरे में ही टँगे रहने देतीं, पर रात को उसके लिए कुछ मीठा अवश्य रखतीं।

फेमू का इस घर में आने का किस्सा भी अनोखा था। रहमान मियाँ को यह तोता शर्माइन बीबीजी ने दिया था। उनके यहाँ वे दो महीने में एक बार कबाड़ लेने पहुँच ही जाते थे। पेपर की रद्दी भी मिल जाती थी। इस घर से उनका एक अजीब-सा रिश्ता जुड़ गया था। स्नेह के इस रिश्ते में ख़र्च कुछ नहीं होता था। बीबीजी के पास ही फेमू तोता था। उनकी बिटिया ने इस तोते को बहुत प्यार से पाला था। बाहर से लौटती तो वह चहकने लगता, “विधु आ गई. . . विधु आ गई।” अब विधु अपनी ससुराल चली गई थी। फेमू के रहते बीबीजी को विधु की बहुत याद सताती। फिर अब उनसे उसकी देखभाल होती भी नहीं थी। एक दिन पिंजरे का पल्ला खुला रह गया तो बिल्ली ने झपट्टा मार ही दिया। वह तो ख़ैर, उनकी नींद खुल गई और तोते की जान बच गई। उसी दिन उन्होंने सोच लिया था कि तोते को किसी को दे देंगी, जो उसे प्यार से पाल सके। रहमान बरसों से इस घर में आ रहे थे। तोता भी उन्हें पहचानने लगा था। एक दिन बीबीजी ने तोते को देने का ज़िक्र किया तो रहमान को मुँह माँगी मुराद मिल गई। बहुत दिनों से उनका अरमान था कि किसी परिंदे को पालें, फिर यह तो विधु का सिखाया-पढ़ाया तोता था। उन्होंने अपने लिए फेमू को बीबीजी से माँग ही लिया। तब से फेमू रहमान के ही साथ था। अब तो उसे फेरी पर निकलने की आदत हो गई थी। रहमान के लिए तो फेमू दोस्त बनकर आया था। फेमू समझे या न समझे, पर रहमान हर दुख-सुख उसे बताते थे। फेमू उनके कंधे पर बैठा टोका देता, जैसे सब कुछ समझ में आ रहा हो।

रहमान, उनकी बीबी फेहमिदा, फेमू और दो बकरियाँ ही घर में थे। बकरियाँ जितनी फेहमिदा से चिपकी रहतीं, उतना ही फेमू रहमान से। पर बकरियाँ ‘में. . . में. . .’ के अलावा कुछ कह नहीं पाती थीं। उनकी आँखों की भाषा फेहमिदा पढ़ लेतीं और वे भी उनके हाव-भाव समझ लेतीं। अपने इस संसार में पाँचों प्राणी सुखी थे। अच्छू-लच्छू उनके दो बेटे थे। दोनों घर के पीछे वाले हिस्से में रहते थे। सब अपने-अपने काम में व्यस्त थे। रहमान को अपेक्षा भी नहीं थी किसी से। पंख निकलने पर परिंदे भी अपना घोंसला छोड़ देते हैं। फिर कभी वापस नहीं लौटते। उनकी उड़ान अनंत आकाश और धरती के बीच निर्बाध जारी रहती है। नई इच्छाएँ परवान चढ़ती हैं, उनको भी तो पूरा होना चाहिए। फिर क्यों वे बंधन की ओर पीछे मुड़कर देखें? नया आशियाना उन्हें भी चाहिए। आदमी के लिए क्या कहा जाए, वह तो सबको बाँधकर रखना चाहता है। वह ख़ुद भी बँधा होता है। इसी में वह अपना सुख-सुकून तलाशता है।

गोल भरा हुआ चेहरा, छोटी नाक, लंबी ठुड्डी, उस पर चने बराबर मस्सा, थोड़ा भारी शरीर, निकलता हुआ क़द और हरदम बोलती आँखों वाली फेहमिदा अपनी क़िस्सागोई से पूरे मोहल्ले में जानी जाती थीं। बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते थे। हर शाम कुछ न कुछ बच्चे आ ही धमकते थे। धार्मिक-सामाजिक जलसों में तो स्त्रियाँ उन्हें घेरे रहतीं। घर में वे दो इंसान ही थे, पर फेहमिदा ने फेमू और बकरियों को भी अपने घर का सदस्य मान लिया था। जो घर के सदस्य थे वे तो पराये हो गए, पर फेहमिदा को कोई गिला नहीं था। ग़ुस्सा तो उन्हें तब आता था जब रहमान सारी बातें फेमू को माध्यम बनाकर फेहमिदा को सुनाते थे। जैसे फेमू ही सब कुछ हो गया। सीधे-सीधे बात नहीं हो सकती थी। रहमान सरल थे। बीबी के ग़ुस्से पर उन्हें हँसी आती। फेहमिदा कुढ़तीं, फिर खिलखिलाकर हँस पड़तीं। फेमू भी उनका साथ देता। रहमान साठ पार थे, फिर भी श्रम की आदत थी। घर के छोटे-छोटे काम भी कर देते थे। अपने ठेले का रखरखाव और बाहर के काम तो वे करते ही थे, पड़ोसियों को मदद की ज़रूरत होती तो हरदम तैयार रहते थे।

अब वे दिन तो रहे नहीं जब ईरानी होटल के सामने यारबाज़ों के गप्प-गुल्ले चलते थे। शाम उतरते-उतरते बंबई बाज़ार चौराहे पर रोशनियों का आमंत्रण खींचने लगता। जैसे-जैसे रात गहराती, वैसे-वैसे रागों का महीन जादू ख़ुमारी ला देता। फिज़ा ही बदल जाती। दिन जो किरातियों और ग्राहकों की चिल्ल-पों से बंबई बाज़ार को ऊबाऊ बना देता, रात उसी को अपनी मलमली चादर से ढाँक लेती। गलियाँ आबाद हो जातीं रंगीनियों से। कहीं तबले की थाप सुनाई देती, तो कहीं घुँघरुओं की झंकार। सुनहरे वे दिन तो जाने कहाँ चले गए। आज तो हर चीज़ बिकाऊ हो गई। रंगीनियाँ लौट गईं। दिन रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकने लगा। रात किसी अपराध की पनाहगाह बन गई। वक़्त ने बंबई बाज़ार को ऐसा नासूर दिया कि वह कराह उठा। अपनों के ज़ुल्म ने उसे बदनाम कर दिया। संकरी-संकरी गलियाँ, एक दूसरे से सटे मकानों को जब जन-ज़मीन की सघनता मिली, तो वे सँकरे और सँकरे होते गए। सूरज रोज़ आता, पर मकानों की ऊँची दीवारों से टकराकर लौट जाता। प्रकाश की कमी सेहत, सीरत और बरकत पर भारी ही पड़ती है। रहमान मियाँ इसी का खामियाज़ा भुगत रहे थे। रहने को मकान तो था, पर रोशनी की कमी ने न धन बढ़ाया, न शिक्षा। हुनर कब तक साथ देता? साइकिल के पंचर जोड़ने वाले हाथ क्या करते, जब धीरे-धीरे साइकिलें ही सड़क से नदारद होने लगीं। मजबूरन उन्होंने कबाड़ इकट्ठा कर बेचना शुरू किया। अपनी जमा-पूँजी से हाथठेला ख़रीदा। अच्छू-लच्छू भी ज़्यादा पढ़ नहीं सके। सरकारी सहायता तो मिलती नहीं थी। घरों की पुताई कर वे भी ख़र्च में सहयोग देने लगे। कमाने वाले हाथ जब अपना हक़ समझने लगे, तो रहमान ने उनका निकाह कर दिया। फेहमिदा का घर में एकछत्र राज्य था। बहुओं के आने के बाद उसमें सेंध लग गई। दोनों बहुएँ सगी बहनें थीं। उनकी आपस में ख़ूब छनती थी। फेहमिदा को लगता, वह अकेली पड़ती जा रही हैं। अकेली वे पहले भी थीं। रहमान, अच्छू-लच्छू नौ बजे काम पर चले जाते थे। फेहमिदा घर के काम निपटातीं। दो बकरियाँ उन्होंने पाल रखी थीं, उनका काम करते-करते कभी अपना अकेलापन जान ही नहीं पाती थीं। बहुओं ने घर का काम सँभाल लिया था। वे उनका लिहाज़ भी करती थीं। पर न जाने क्यों फेहमिदा को लगता था कि घर अब बहुओं का हो गया है, वह बाहर कर दी गई हैं। बकरियों की देखभाल उनका ही काम था। अब वह बकरियों को चराने में अधिक समय लगाकर लौटतीं। अच्छू-लच्छू कमाने लगे थे। बहुओं को उनके रुपयों पर घमंड होने लगा था। फेहमिदा को अब तक अपने अकेले होते जाने पर दुख नहीं था, पर जब रुपया बहुओं की बुद्धि पर हावी होने लगा, तो घर में रोज़ कलह होने लगी। रोज़-रोज़ के झगड़ों से तंग आकर रहमान ने मकान के पीछे के दो कमरे अच्छू-लच्छू को अलग रहने के लिए दे दिए। बहुएँ यही तो चाहती थीं। अब रहमान-फेहमिदा के पास एक कमरा और दालान रह गई थी। उनके परिवार से चार लोग भले ही चले गए, पर फेमू के रूप में एक नया सदस्य आ गया था। फेमू था ही इतना चंचल कि उसने जल्दी ही फेहमिदा को अपना बना लिया था। दोनों बकरियों की पीठ पर फुदकता वह उन्हें भी लुभा लेता। बकरियाँ ‘में . . . में . . . ’ करतीं, वह उनसे पूछता, “का . . . हे . . . का . . . हे’। रोज़ ही घर में फेमू और बकरियों का यही प्रलाप चलता। फेहमिदा चिल्लातीं, “मरदुओं, चुप रहो।” पर फेमू कहाँ सुनता! वह रोटी बनाती फेहमिदा के कंधे पर सवार होकर “रोटी . . . दे . . . रोटी . . . दे” की रट लगाता। फेहमिदा अपने इन बच्चों के बीच निहाल हो जातीं। सुबह फेमू भी समझदार बच्चे की तरह उनके आगे-पीछे कूद-फाँद करता रहता। रात को तो फेहमिदा उसे पिंजरे में बंद करके टाँग देतीं।

रहमान के फेरी पर निकलने से पहले फेहमिदा उसके पिंजरे को साफ़ कर पानी की कटोरी रख देतीं। दूसरी कटोरी में चने की भीगी दाल रख देतीं। अब वह निश्चिंत थीं, फेमू का दिन भर के दाने-पानी का प्रबंध हो गया। फेमू भी तैयार रहता रहमान चाचा के साथ जाने को। फेमू को फेरी पर जाने का इतना चस्का था कि वह नौ बजे से पहले ही “चलो. . . चा. . . चओ. . . चा” पुकारने लगता। “चओ. . . चओ. . .” रहमान भी उसके साथ सुर मिलाते, “आज अहिल्या पलटन चलना है, फिर सदर बाज़ार, फिर रामबाग तक। समझ आ गया न फेमू?” फेमू आँख झपकाता। “फेमू से ही बोलोगे कि मेरी बात भी सुनोगे? लौटते में तेल और खड़ा गरम मसाला लेते आना। अहिल्या पलटन जा रहे तो नज़ीर के यहाँ से सूरजने की फली लेते आना। मुँह का ज़ायका बदल जाएगा। गोश्त खाने की हैसियत रही नहीं।”

“हाँ! हाँ, लेते आऊँगा। ठीक है फेमू, याद दिलाना।”

भीषण गर्मी और लू के थपेड़े बेहाल कर रहे थे। सूरज सिर पर था। रहमान ने एक घने छायादार पेड़ के नीचे ठेला रखा और पेड़ के तने से टिककर सुस्ताने लगे। फेमू के पिंजरे पर उन्होंने अपना गमछा डाल दिया था, ताकि उसे धूप न लगे। पेड़ की छाँह में फेमू को भी सुकून मिला। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद रहमान ने खाने का डिब्बा निकाला। आज उनका खाने का मन नहीं था, किंतु चलने के लिए खाना भी ज़रूरी था। फेहमिदा ने कितने प्यार से ये रोटियाँ रखी थीं। रोटियाँ न भाएँ तो छाछ-चावल भी रखे थे। ख़ुद बीमार थीं दस दिनों से, पर खटती रहती थीं।
“आज जल्दी घर लौटूँगा, उन्हें हकीम जी के पास ले जाऊँगा। उनकी दवा से ठीक हो जाएँगी। फेहमिदा ने सूरजने की फली लाने को कहा है, वह भी नज़ीर के यहाँ से लेना है। उनकी बहुत इच्छा है फली खाने की।

“चल फेमू बेटा, जल्दी खा,” रहमान ने थोड़े चावल में छाछ मिलाकर फेमू को दिए, ख़ुद रोटी खाई। आधे घंटे बाद वे ठेला लेकर फेरी के लिए चल पड़े। गर्मी के कारण प्रायः सभी मकानों के दरवाज़े बंद मिले। नज़ीर के यहाँ से फली ली। आज बेचैनी घेरे रही थी। जाने क्यों मन बार-बार घर की ओर खींच रहा था। रहमान ने घर लौटना ही ठीक समझा। चार बजते-बजते सलीम चायवाले की दुकान से गुज़रे, तब रुके नहीं, सीधे घर आए। ठेले को ठिये पर रखा। फेमू का पिंजरा दालान में टाँगा। घर के किवाड़ उधड़े थे। रहमान किवाड़ ठेलकर अंदर आए, देखा फेहमिदा बेसुध पड़ी थीं। हिलाया-डुलाया, कुछ समझ नहीं आया। अच्छू-लच्छू को आवाज़ दी। दोनों बहुएँ दौड़ी आईं। अच्छू-लच्छू तो काम पर गए थे। मुँह पर पानी के छींटे डालने पर भी फेहमिदा को होश नहीं आया। रहमान ने ठेले का कबाड़ फटाफट उतारा। गद्दा डालकर बहुओं की सहायता से फेहमिदा को ठेले पर लिटाया। चादर की छाँह की ओर हाथठेला धकेलकर अस्पताल की ओर दौड़े। अच्छू की दुल्हन भी साथ-साथ गई। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते रहमान पसीने से तर हो चुके थे। बहू ने दौड़कर वार्ड बॉय को बुलाया। फेहमिदा को स्ट्रेचर पर डालकर ओ.टी. में पहुँचाया, तब तक डॉक्टर भी आ गया। उसने फेहमिदा की नब्ज़ टटोली और रहमान की ओर देखकर बोला, “अब कुछ नहीं बचा, देर हो चुकी।”

रहमान धप्प से ज़मीन पर बैठ गए। कुछ देर तक सन्नाटा रहा।

“चाचा, चलें।” बहू की आवाज़ से रहमान की चेतना लौटी। वार्ड बॉय की मदद से फेहमिदा को ठेले पर लिटाया। थके क़दमों से रहमान घर लौटने लगे। एक-एक पैर मन भर का हो गया। ज़िंदगी की चाह में जिन पैरों में परवाज़ की उड़ान भरी थी, मृत्यु ने उन्हीं पैरों को शिथिल कर दिया था। घर के पास आते ही बहू दौड़कर अंदर गई। फेहमिदा की मृतदेह को अंदर लिया। रहमान दालान में दोनों हाथ फैलाए परवरदिगार से रहम की भीख माँग रहे थे। दोनों बकरियाँ एक साथ ‘में. . . में. . .’ करे जा रही थीं। फेमू अपनी गोल-गोल आँखों से रहमान को देखता, फिर घर में आती स्त्रियों को देखता। उसे समझ नहीं आ रहा था, क्या करे।

एक दिन, दो दिन. . . करते आज पूरे आठ दिन हो चुके थे। अभी तक बहुएँ खाना ला देती थीं। अब घर एकदम सूना था। खाना भी रहमान को बनाना था। बकरियों की देखभाल करनी थी। कबाड़ लाना और बेचना था। जब तक जीवन है, इससे छुटकारा कहाँ? फेहमिदा के जाने से वह पत्थर हो गए थे, पर अब जो सामने था उसने पिघला दिया। बकरियों को उन्होंने बेच दिया। बेबस थीं बेचारी, चिल्लाती रहीं, पर रस्सी से बँधी, ख़रीददार के साथ जाना पड़ा। फेमू भी टें-टें करता रहा। बकरियों की पीठ पर फुदकना. . . फिर उनके सींगों से परे हटना उसकी दिनचर्या में शामिल था। बकरियों को बेचने के बाद रहमान घर से बेफिकर हो गए। दिन अब कटते थे, घर काटता था। फिर भी जीना तो था। फेमू का साथ कुछ सुकून भर देता। अब वे कबाड़ बेचकर ही घर लौटते। आज लौटे तो आठ बज चुके थे। उन्होंने फेमू का पिंजरा दालान में टाँगा और उसका पल्ला खोल दिया। फेमू पिंजरे में ही बैठा रहा। रहमान ने हाथ-मुँह धोकर खिचड़ी पकने रख दी। भूख ज़ोर से लग रही थी। गर्मी की उदास रात थी, उन्होंने दालान में ही अपनी खाट बिछा ली। फेमू अभी पिंजरे में बैठा था। अच्छू-लच्छू के बच्चों के लड़ने की आवाज़ आ रही थी। रहमान ने फेमू को आवाज़ लगाई, “आ जा फेमू, आ, वहाँ क्यों है? आ जा नीचे।” फेमू कुछ नहीं बोला। रहमान पिंजरे के पास गए, फेमू को निकाला, “चल खिचड़ी खाएँगे।” फेमू चाचा के कंधे पर बैठ गया। रहमान ने एक थाली में खिचड़ी उड़ेली, एक प्याज़ और तीन-चार हरी मिर्च ली और खाट पर आ बैठे, “ले फेमू, पहले मिर्च खाएगा?” फेमू उड़कर पिंजरे में जा बैठा। रहमान को अजीब लगा। वे पिंजरे के पास गए, “क्या है फेमू. . . भूख नहीं है?” फेमू एकटक देखता रहा। उसकी आँखों से दो बूँदें रहमान के हाथ पर गिरीं। रहमान ने प्रश्नसूचक नज़रों से फेमू की ओर देखा।

फेमू ने चोंच खोली, “च. . . चाचा. . . चाची कहाँ गईं?”

रहमान की पत्थर होती आँखों में नमी उतरने लगी। उन्होंने फेमू पर प्यार से हाथ फेरा और उसे नीचे उतार लिया।

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