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रोशनी की वह लहर

 

हर साल की तरह इस साल भी 19 मई को रोशनी की बेटी कलि ने अपनी माँ को नैनीताल की फ़्लाइट टिकट ईमेल पर भेज दिया। 21 तारीख़ सुबह की फ़्लाइट थी। पिछले पाच सालों से रोशनी ने मई महीने का यह आख़िरी हफ़्ता कहीं एकांत में बिताने का निर्णय लिया है। वह कहाँ जाती है, क्यों जाती है वह एक रहस्य है। उसके जीवन का एकमात्र हमराज़ सिर्फ़ उसकी बेटी कलि है। अपनी माँ के साथ उसका एक अलग प्रकार का लगाव है। वे दोनों माँ-बेटी कम और सहेली ज़्यादा थीं। 

रोशनी किसी को इस एकांतवास का हिस्सा नहीं बनने देना चाहती थी क्योंकि तमाम टुकड़ों में बँटते-बँटते, उसने अपना एक हिस्सा कहीं पर सुरक्षित रख दिया था। यह उसकी ज़िंदगी का वह हिस्सा था जिस पर केवल उसका अपना अधिकार था। एक समझदार पत्नी, माँ, बहन, बेटी, बुआ और अनंत रिश्तों को बख़ूबी निभाने वाली रोशनी, एक अत्यंत भावुक लेखिका भी थी। उसे लिखने का शौक़ बचपन से ही था। मगर माता-पिता को रोशनी के उस हुनर की कोई क़द्र नहीं थी। कॉलेज की पढ़ाई किसी तरह ख़त्म करते ही उसकी शादी करा दी। रोशनी के मन में उसके होने वाले पति की कोई कल्पना बन पाती उससे पहले ही उसे पति के हवाले सौंप दिया गया। 

21वीं शताब्दी में 19वीं शताब्दी की मानसिकता में जीने वाले एक परिवार में रोशनी ने जब क़दम रखा तो उसे वही सही दुनिया लगने लगी थी। रोशनी के ससुर बहुत बड़े विद्वान थे जो अपने और अपने बेटों की तुलना में सबको बुद्धिहीन और कूपमंडूक समझते थे। दुनियाँ भर की औरतों को सबलीकरण का उपदेश देनेवाले, अपने घर की बहुओं और पत्नी को चूल्हा चौका और बच्चों के लालन पालन तक ही सीमित रखते थे। 

रोशनी ने अपने जीवन के साथ समझौता कर लिया था क्योंकि उसके पास दूसरा कोई उपाय भी नहीं था। शादी के कुछ साल बाद कलि पैदा हुई। कलि को पढ़ाते हुए उसने अपनी आगे की पढ़ाई की और अपने आप को नौकरी के लिए तैयार किया। जब कलि छह साल की हुई तब से रोशनी कॉलेज में नौकरी करने लगी। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि उसके इस निर्णय पर घर में कितना बवाल उठा, पर रोशनी अपनी जगह पर अड़ी रही। कॉलेज में दिनभर पढ़ाने के बाद घर का काम उसके लिए इंतज़ार करता और कई इल्ज़ाम भी। कभी-कभी कॉलेज से लौटते समय कुछ मिठाई ख़रीद लाती तो ससुर जी ताने मारकर कहते, “लो आज कल की बहुएँ तो पैसा देकर प्यार और कर्त्तव्य ख़रीद लाती है।” रोशनी सोचती थी इन बातों को दिल पर लगाने का क्या फ़ायदा? इससे तो अच्छा है चुपचाप अपने काम पर मन लगाओ और आगे बढ़ो। 

जीवन के इन पहलुओं के बीच रोशनी बहुत गहराई से इंसानों को समझने की कोशिश कर रही थी, ख़ासकर पुरुषों को। 

जब घर के मर्द अपनी मर्ज़ी से दिन में जागते, रात को सोते और बिना कोई ज़िम्मेदारी उठाए सिर्फ़ मज़े में अपनी ज़िंदगी बिताते तो रोशनी के मन में अपने और अपनी बेटी के भविष्य को लेकर सैंकड़ों सवाल उठते। 
कभी-कभी पति से कहती, “सुनो तुम्हें नहीं लगता कि हमारी आमदनी बढ़नी चाहिए?” 

उसके पति अति आत्मविश्वास के साथ कहते, “अरे इतना क्यों सोचती हो? जब पैसे चाहिए, कमा लूँगा। क्या तुम्हें किसी बात की कोई कमी है? और तुम जो कमाती हो वह तो तुम्हारा है, मैंने कभी कुछ पूछा है क्या? इन्जॉय लाइफ़।” 

रोशनी अपनी तनख़्वाह में से लगभग आधी रक़म जमा करने लगी, बैंक में रेकारिंग डेपोज़िट तो कभी फ़िक्स्ड डेपोज़िट तो कभी म्यूचूअल फ़ंड। उसके मन में हमेशा इस बात को लेकर डर रहता था कि कभी भी बेटी की पढ़ाई में या अपने जीवनशैली में पैसों के कारण कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। उसके जीवन में मनोरंजन नाम की कोई वस्तु थी ही नहीं। उसके घर के बाक़ी लोगों से उसके पति बिल्कुल अलग थे, न उन्हें ज़्यादा बात करनी अच्छी लगती, न लोगों से मिलना। यहाँ तक कि जब रोशनी के माँ-बाप उससे मिलने आते, वह कभी-कभी सीधे मुँह बात तक नहीं करते। यह भी उस परिवार की एक ख़ास बात थी कि बहुओं के मायके वालों को वे हीन दृष्टि से देखते थे। मायके में कोई अनुष्ठान हो तो रोशनी हमेशा अकेली जाती। पूजा-पाठ, शादी-ब्याह, जन्मदिन, गृह प्रवेश, चाहे कोई भी अनुष्ठान हो, अगर जाना हो तो रोशनी अकेली जाती, कभी-कभी बेटी कलि को ले जाती। मायके की तरफ़ से सब उसका मज़ाक उड़ाते थे। रोशनी से पहले पूछते, “अरे तेरे पति नहीं आए?” हर बार की तरह रोशनी संकोच के साथ कहती, “वह बिज़ी हैं, काम का डेडलाइन है।” 

फिर वही रिश्तेदार उस बात की कड़ी को पकड़कर कहते, “भई हमने भी काम किए हैं, मगर इतना व्यस्त है तेरा पति कि इतने सालों में तेरे साथ उसे हम देख ही नहीं पाए। क्यों बहुत पैसा कमा रहे होंगे?” 

एक सूखी मुस्कान के साथ रोशनी समझने की कोशिश करती कि सच ही तो है। उसके मायके और ससुराल की तरफ़ से सभी औरतों के साथ उनके पति अनुष्ठानों में साथ जाते हैं। मगर यहाँ हमेशा उसे अकेले जाना पड़ता है। अपने मन को समझाना चाहती कि कोई बात नहीं, मेरे पति को यह सब पसंद नहीं तो क्यों परेशान करूँ?” 

चारों तरफ़ से शब्दों की चोट को सहते हुए जब रोशनी घर लौटती तो अक़्सर देखती कि पति घर में बैठे या तो किताब पढ़ रहे हैं या अपने भाई के साथ बैठकर चाय पी रहे हैं या अपने लैप टॉप पर कोई फ़िल्म देख रहे हैं। 

रोशनी को बचपन से सिखाया गया था कि पति का सम्मान करना चाहिए। मगर जाने-अनजाने उसके मन से वह सम्मान धीरे-धीरे ख़त्म होने लगा था। शादी के लगभग पंद्रह-सोलह साल यूँ ही बीत गए। रोशनी कभी-कभी अपने पति के पास जाकर कहती, “मुझे मॉल ले चलोगे? कुछ सामान ख़रीदना है।” अगर इनका मूड बहुत अच्छा रहता तो चलते और अगर जाने का मन न होता तो जवाब मिलता, “क्यों मैं तुम्हारा ड्राइवर हूँ क्या? बहुत काम है। तुम आज़ाद हो, बेटी को लेकर जाओ।” रोशनी कैसे कहती कि उसका भी मन करता है सज-सँवरकर पति के साथ घूमने जाए जैसे उसकी सहेलियाँ या बहनें जाती हैं। एक-दो बार अगर ज़िद करती तो मुँह लटकाकर निकलते। कई बार ऐसा हुआ कि मॉल में जाकर उसे कुछ पसंद आ जाता और पति से लेने का आग्रह करती तो सपाट उत्तर आता, “यह तुम्हारे ऊपर नहीं जँचने वाला। हम कहीं और से कुछ ले लेंगे। यहाँ से लेने लायक़ कुछ है भी नहीं।” रोशनी बात मान जाती और चुपचाप लौट आती। 

इस तरह और कई साल बीत गए। 22 साल की रोशनी 40 की हो गयी। तब भी वह पुरुषों को समझने की कोशिश कर रही थी। मगर अब उसके समझ में इतनी बात आ चुकी थी कि दुनियाँ में उसके परिवार के पुरुष ही ग़लत है, बाक़ी दुनियाँ ठीक-ठाक ही चल रही है। अपनी शादी, एक ऐसे पुरुष का साथ निभा रही थी जो शादी के पहले से ही कुछ मानसिक रोगों का शिकार था। मगर बाहर से सब कुछ सही दिख रहा था। महीने के 30 दिनों में 15 दिन उसके पति उससे बात करते (कभी-कभी दस दिन) और बाक़ी दिन कोई न कोई वजह लेकर मुँह फेरकर रह जाते। ऐसे वक़्त पर रोशनी लगातार अपने आप को टटोलती “आख़िर मेरी ग़लती क्या है? एक बार बता दे तो मैं सुधार लूँ।” मगर पति से पूछने के बाद वह इतना ही जवाब देते कि, “इतनी समझदार हो, इतनी सी बात नहीं समझती कि तुम्हारी ग़लती क्या है?” 

औरतों को अपनी ग़लतियाँ गिनवाने का मज़ा उस घर के सारे पुरुष लेते थे। रोशनी दंग रह जाती। लगभग बीस सालों में उसने पति के साथ सम्बन्ध का भी ज़्यादा आनंद नहीं उठा पाई क्योंकि महीने के जिन दस दिन पति का मूड अच्छा रहता उसके नसीब में पत्नी सुख होता। बाक़ी दिन ऐसे ही बीत जाते। प्रेम का अंतराल बढ़ते-बढ़ते कभी एक महीना भी हो जाता। 

पति के तरफ़ से उसे कुछ भी नहीं मिलता था। न शारीरिक सुख, न भविष्य के लिए कोई संचित निधि, न आत्मिक सुख और न ही एक दोस्त जैसा साथ। रोशनी के लिए, ‘मेरा भी एक पति है’, कहने के अलावा और कुछ नहीं था। हाँ, कभी-कभी वह उसे यह ज़रूर कहते, “तुम्हें मैंने आत्मनिर्भर बनाया है और क्या चाहती हो? जैसा तुमने चाहा वैसी ज़िंदगी जी रही हो, मुझसे कुछ उम्मीद क्यों करती हो? ख़ुद कमाओ, ख़ुद बचत करो अपने भविष्य के लिए। वैसे मुझे तो कुछ भी नहीं चाहिए, जैसा हूँ ठीक हूँ।” रोशनी समझ गई कि यहाँ से यह पुरुष अपना पल्ला झाड़ रहा है। न उसे पैसे कमाने हैं और न ही भविष्य के लिए कोई बचत। अब तक उसने उस घर के पुरुषों को अच्छी तरह पहचान लिया था। सम्मान की भावना तो बहुत पहले ही जा चुकी थी जिसे लोग प्रेम कहते है, रोशनी ने उसे भी अपने जीवन से मिटा दिया। 

मगर दिल के किसी कोने में एक इच्छा दबी हुई थी, एक ऐसे पुरुष से दोस्ती, जो कम से कम उससे ग़लतियाँ न गिनवाए, बात-बात पर रूठकर बात करना बंद न कर दे, कोई हो जो उसे हँसा सके, प्यार से समझा सके और भविष्य के लिए सलाह दे सके। रोशनी ने पैसा कमाना तो सीख लिया था मगर उसका जीवन अकेलेपन से भरा हुआ था। 

उसके काले बालों के बीच सफ़ेद बाल झाँकने लगे थे और चेहरे पर कान्ति फीकी पड़ती चली गयी। पति के साथ अब वह नज़दीकी महसूस नहीं करती थी। उन पलों में वह थक जाती क्योंकि उसमें प्रेम नहीं बल्कि एक शारीरिक भूख को तृप्त करने की तत्परता होती। रोशनी अपने पति से आयु में बहुत छोटी थी मगर संन्यास का ऐलान उसने ही पहले कर दिया। मन अब शरीर के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा था। उसे लगा कि शायद बुढ़ापा बहुत जल्दी मुझे निगल जाएगा। मगर शायद ईश्वर को कुछ ही मंज़ूर था। 

कोरोना के समय ज़ूम पर एक दिन रोशनी एक कवि सम्मेलन में प्रतिभागी के रूप में भाग लिया। कई लोग आभासी पटल पर अपनी कविताएँ सुना रहे थे। उन्हीं में एक कवि की कविता ने रोशनी को बहुत भीतर तक छू लिया। कवि का नाम जो भी हो मगर उनका कविनाम ‘लहर’ था। रोशनी को बार-बार लहर की कविता याद आने लगी। सोते जागते उसकी आवाज़ उसके कानों में गूँजने लगी। कार्यक्रम के आयोजकों के माध्यम से रोशनी ने उनसे संपर्क किया। 

एक हँसमुख इंसान, जिनकी बातें इस घर के पुरुषों से बिल्कुल अलग थी। उसमें अहंकार लेश मात्र भी नहीं था। रोशनी और लहर की बातें होने लगीं। देश के दो प्रांतों में रहने वाले दोनों में धीरे-धीरे दोस्ती पनपने लगी। रोशनी ने अपने मन में सोचा, जीवन को एक मौक़ा और देना चाहिए। कुछ नहीं, तो कम से कम एक दोस्त, जिससे बात करके मुझे सुकून मिले। 

जीवन में कई सुखों से वंचित रोशनी को अब एक ही सुख चाहिए था, आत्मिक सुख, जहाँ कोई ताना नहीं, डर नहीं, बस अपने आप को देखने का एक आईना मिल जाए। एक-दो बार बात करके लहर ने रोशनी से कहा, “तुम काफ़ी सुंदर बातें करती हो, कुछ लिखती भी हो या नहीं?” 

रोशनी ने सकुचाते हुए कहा, “कुछ ख़ास नहीं। बस यूँ ही। हाँ, शादी के पहले बहुत लिखती थी मगर उसके बाद कुछ ज़्यादा नहीं लिख पाई।” 

“तो अब कहाँ देर हुई है? शुरू कर दो। चलो हम दोनों लिखते हैं और एक दूसरे के साथ शेयर करते हैं। यह कैसा रहेगा?” लहर ने मुस्कुराते हुए कहा। 

रोशनी ने एक पल में सोचा, “यह इतना अच्छा लिखते हैं! मैं इनको अपनी बकवास लेखनी कैसे दूँ?” उसने हामी भरी और लैपटॉप लेकर सोचने लगी। न जाने अपने ख़्यालों के उधेड़बुन में वह कहाँ चली गयी। एकाएक शब्द बनते चले गए और रोशनी की उँगलियाँ कीबोर्ड पर मचलती हुई चलने लगी। न जाने कितनी देर वह खोई रही अपनी रचनाओं में . . . उसे ख़ुद यक़ीन नहीं हो रहा था कि वे शब्द उसके हैं। 

कितने सालों के बाद! 

वह भूल गयी थी, अपना यह हिस्सा, जिसे कहीं छुपाकर रख दिया था। रोशनी को जैसे कोरोना काल में जीवन का एक उद्देश्य मिल गया हो। 

उसने लहर को ईमेल किया। 

कुछ देर बाद जवाब आया, “बेहतरीन! सुनो अपने ग़म को शब्दों का रूप दे दो। बह जाने दो उनको, नए तरीक़े से जीवन को देखो। तुम जितनी सुंदर हो उतना ही सुंदर लिखती हो। जहाँ-जहाँ जो कमियाँ हैं मैं बता दूँगा, तुम वैसे उसे ठीक कर लेना।” 

रोशनी ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। उसे आज जी भरकर रोना था। चीख़-चीख़ कर रोना था। वह आत्मिक साथी जैसे उसे मिल गया हो। जिसने न तो उसके रंग-रूप, क़द काठी पर कोई सवाल उठाया, न ही उसकी कमियाँ गिनवायीं, न उसकी ग़लतियों को देखकर मुँह मोड़ लिया। उसने उसके उस अँधेरे हिस्से को रोशन किया जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता था। रोशनी ने अपनी आँसुओं को बहुत देर तक बह जाने दिया क्योंकि उससे धुलकर उसका चेहरा फिर से कांतिमय बन रहा था। चेहरा चमकने लगा, उसकी आखें फिर से उस 22 साल की लड़की जैसी सपनों से सज गयी। सूनेपन का स्थान सृजन कला ने ले ली। 

रोशनी के जीवन में इस घटना के घटित होने का समय, मई का आख़िरी सप्ताह था। 

रोशनी की बेटी कलि भी अब सयानी हो चुकी थी। 

अपनी माँ की जीवन यात्रा को कलि ने बहुत सूक्ष्मता से देखा। माता-पिता के बीच तनाव को उसने हमेशा समझा था। अपनी सहेलियों के माता-पिता की तुलना में उसके माँ बाप को एक साथ खाते-पीते, घूमते-फिरते, हँसते हुए उसने बहुत कम देखा था। अपनी माँ को दूसरी औरतों के जैसे सजते-सँवरते, सहेलियों के साथ घूमते हुए भी नहीं देखा था। फिर भी माँ कभी शिकायत नहीं करती थी। कलि चाहती थी जैसे भी हो माँ और पिता, अपनी-अपनी ज़िंदगी में ख़ुश रहें। वह जानती थी अपनी बेटी के लिए दोनों ने अपने बीच दूरियाँ होते हुए भी पास रहने का निर्णय लिया था। 

समय ने अपना रुख़ लिया। 

रोशनी के जीवन में अब वह लहर था, उस आभासी दुनियाँ में रहने वाला एक सच्चा इंसान जैसा रोशनी ने हमेशा चाहा था। अपनी तमाम उम्र पुरुषों को पढ़ने के बाद उसने यह समझ लिया था कि पुरुष वह होता है जिसमें मुश्किलों के आगे अड़ जाने की हिम्मत हो, जो औरत की सुरक्षा को अपने अहम के आगे रखे, जिसे भविष्य की चिंता हो, जिसमें धैर्य हो, जो अपनी पत्नी के साथ अनुष्ठानों में जाए और अपने ससुराल वालों का भी सम्मान करे, जो अपने भाई-बहनों के लिए ज़िम्मेदार हो, जो अपने ख़ुद के माता-पिता का सम्मान करे और सबसे बढ़कर उस औरत को उसके सुख से वंचित न रखे जिसने उसके सुख के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया। हाँ, लहर में वह सारी बाते थीं। दोनों की दोस्ती क़लम से क़लम तक के सफ़र के कुछ आगे भी निकल गई जिसे केवल कलि जानती थी जिसने अपनी माँ को आगे बढ़ने के लिए कहा था। 

21 मई की सुबह रोशनी को एयरपोर्ट छोड़ने के लिए कलि ख़ुद आई। 

“मम्मी नैनीताल में बहुत ठंड है। गरम कपड़ों में ही रहना, ज़्यादा रोमांटिक बनने के चक्कर में बुख़ार न हो जाए,” हँसते हुए उस भोली लड़क़ी ने कहा। 

“कलि तुझसे एक बात पूछूँ?” रोशनी का सवाल पूरा होने से पहले कलि का जवाब तैयार था।

“तुमने मुझे ज़िंदगी अच्छे से जीने की सीख दी है न? तुम भी जी लो माँ, एक ही बार ज़िंदगी मिलती है। जाओ अपनी दुनियाँ में, एक हफ़्ता तुम इस औरत को भूल जाओ। तुमने अपने बहुत टुकड़े कर दिए हैं। हैप्पी जर्नी,” गले लगाते हुए कलि ने अपनी माँ से कहा। 

तभी मोबाइल में मैसेज आया, “कहाँ हो?” 

रोशनी ने उत्तर दिया, “रोशनी की लहर की तरफ़ बढ़ रही हूँ।” 

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