अभी शेष है
काव्य साहित्य | कविता अकांक्षा पाण्डेय1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
भँवर से आँख मिलने का साहस अभी शेष है,
मेरे हिस्से की नदी में प्रवाह अभी शेष है।
धूप ने घर-आँगन पर अपना अधिकार लिख दिया,
पीपल की छाँव में फिर भी निर्वाह अभी शेष है।
वक़्त ने राह के मुसाफ़िर के क़दम थका दिए,
मंज़िल की ओर बढ़ने की चाह अभी शेष है।
शहर ने ख़ामोशी को हर ओर फ़रमान कर दिया,
मगर सच के होंठों पर एक आह अभी शेष है।
जो समझते हैं कि हार ही आख़िरी सच है,
उनसे कह दो—जीत का विश्वास अभी शेष है।
जो समझते हैं कि सब कुछ राख होकर मिट गया,
उनसे कह दो—राख के नीचे अंगार अभी शेष है।
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