अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

अवनति

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ, पत्रकारिता;
चाटुकारिता में गिर गया, अब भर-भरा। 

 

सुरक्षा कवच है जो, जनतंत्र का;
गोलियाँ वह भी अब, बरसा रहा।

 

न्याय की तलवार जिसके हाथ है;
पंगु होकर, वह भी चिल्ला रहा। 

 

सदन की गरिमा भी तार-तार है;
दौर चल पड़ा आरोप-प्रत्यारोप का। 

 

उस पर भी छाया है, सत्ता का नशा;
शहर जल रहे हैं लेकिन, उसका क्या?

 

बलात्कारी, भ्रष्टाचारी जो भी हैं इस देश में;
फूल और मालाओं से सम्मान उनका हो रहा।

 

है जन-मानस हिंदू-मुस्लिम में उलझा हुआ;
'जहान' कैसे हो रहा विनाश हमारे देश का?

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

उपलब्ध नहीं

उपलब्ध नहीं