बदली राहें, बदले दोस्त
काव्य साहित्य | कविता सौरभ नोरोजी15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
दोस्त होते हैं सच्चे निस्वार्थ प्रेम दिखाते हैं
साथ हैं खेले साथ हैं पढ़ते और वह बढ़ते जाते हैं
साथ-साथ चलते हैं सब बराबरी का रखते अधिकार।
धीरे-धीरे बढ़ते जाते झूठ और धोखा सीखे जाते
समय पर साथ न दे वो पाते झूठ का साथ वो लेते जाते
चंद सफलताएँ न वो पाते अपनों से हैं, जलते जाते
ख़ुशी न उनके मन को भाये जलन है उनकी बढ़ती जाए
नफ़रत वो करते जाते हैं ग़लत राह दिखाते हैं
सत्य यही है बदली राहें, टूटे रिश्ते बदली बाँहें।
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