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ब्रेन ड्रेन

 

दिल्ली के केंद्रीय सचिवालय के पास एक सरकारी दफ़्तर। सुबह के नौ बजे। अजय अग्निहोत्री अपनी कुर्सी पर बैठकर फ़ाइलें देख रहा था। तीस साल का, दुबला-पतला, साफ़-सुथरे कपड़े। आँखों पर पतला चश्मा। मेज़ पर फ़ाइलों का ढेर, पर सब क़रीने से लगा हुआ। बग़ल की मेज़ पर रामप्रसाद जी अख़बार पढ़ रहे थे। पिछले एक घंटे से। उनसे आगे की कुर्सी पर सुनीता जी मोबाइल पर कुछ देख रही थीं। दोनों आरक्षित वर्ग के थे, और दोनों की यही दिनचर्या थी। अजय ने एक फ़ाइल उठाई। उस पर नोट लिखा। फिर अगली फ़ाइल। तभी उसके मोबाइल पर माँ का फोन आया। 

“अजय, खाना खाया?” 

“हाँ माँ। काम में था।” 

“बेटा, थोड़ा आराम भी किया कर।” 

अजय मुस्कुराया। माँ को क्या बताता—कि यहाँ आराम तो बाक़ी सब कर रहे हैं, बस काम वही करता है। इस दफ़्तर में पचास लोग थे। उनमें से पैंतीस आरक्षित वर्ग के। नियम था—पचास प्रतिशत सीटें आरक्षित वर्ग के लिए। पर यहाँ कुछ और हो रहा था। जो सीटें सामान्य वर्ग के लिए थीं, उनमें भी आरक्षित वर्ग के लोगों को बैठा दिया गया था। ऊपर वाले अफ़सर ख़ुश, नीचे वाले ख़ुश। और जो बचे-खुचे सामान्य वर्ग के लोग थे—वो काम करते थे। बाक़ी सब . . . बस थे। 

रामप्रसाद जी किसी फ़ाइल पर दस्तख़त करने के लिए एक हफ़्ता लगाते थे। सुनीता जी को अगर कोई काम कह दो तो बीमार पड़ जाती थीं। और सेक्शन ऑफ़िसर विश्वकर्मा जी—वो पैसे लेकर काम करते थे। छोटे काम के छोटे पैसे, बड़े काम के बड़े पैसे। अजय यह सब देखता था। पर चुप रहता था। 

क्यों? क्योंकि उसे पता था क्या होता है बोलने वालों के साथ। 

साल पहले श्रीवास्तव जी थे इस दफ़्तर में। अच्छे आदमी। एक दिन उन्होंने विश्वकर्मा जी की शिकायत लिख दी—ऊपर के अफ़सर को। अगले हफ़्ते श्रीवास्तव जी पर एससी/एसटी एक्ट की शिकायत लग गई। आरोप था—उन्होंने विश्वकर्मा जी को जातिसूचक गाली दी। श्रीवास्तव जी अवाक्‌ रह गए। 

“मैंने तो कुछ नहीं कहा!” 

पर सुनता कौन? चार गवाह थे—सब विश्वकर्मा जी के लोग। एससी/एसटी एक्ट में ज़मानत मिलना भी मुश्किल होता है। श्रीवास्तव जी को एक हफ़्ते जेल में रहना पड़ा। फिर ज़मानत मिली। महीनों केस चला। पैसे गए, इज़्ज़त गई, सेहत गई। तब से दफ़्तर में सन्नाटा था। कोई कुछ नहीं बोलता था। 

अजय ने यह सब सुना था। समझा था। और चुप था। पर मन में कुछ उबलता रहता था। एक दिन एक बड़ा मामला आया। एक ग़रीब किसान की ज़मीन का मुआवज़ा फ़ाइल में पड़ा था—तीन साल से। किसान हर महीने आता, विश्वकर्मा जी को मिलता, वो कहते, “काम हो जाएगा। अगली बार आना।” 

पर काम नहीं होता था। अजय ने एक दिन उस किसान को दफ़्तर के बाहर रोते देखा। 

“क्या हुआ?” 

“साहब, मेरा बेटा बीमार है। पैसे चाहिए। पर यहाँ कोई सुनता नहीं।” 

अजय ने फ़ाइल देखी। सब कुछ ठीक था। बस दस्तख़त नहीं हुए थे। उसने विश्वकर्मा जी से कहा। 

“सर, यह फ़ाइल तीन साल पुरानी है। आज दस्तख़त कर दीजिए।” 

“तुम अपना काम करो।” 

अजय रुक गया। कुछ देर सोचा। फिर उसने ऊपर के अफ़सर को मेल लिखी। पूरी फ़ाइल की जानकारी के साथ। तारीख़ें, नाम, सब कुछ। साफ़ और सीधा। अगले दिन दफ़्तर में भूकंप आ गया। विश्वकर्मा जी ने बुलाया। 

“अजय, यह क्या किया तुमने?” 

“सर, मैंने बस सच लिखा।” 

“सच!” विश्वकर्मा जी हँसे। “देखते हैं तुम्हारा सच कहाँ तक काम आता है।” 

तीन दिन बाद। अजय के घर पुलिस आई। एससी/एसटी एक्ट की शिकायत। आरोप—उसने रामप्रसाद जी को जातिसूचक शब्द कहे। अजय का दिल डूब गया। पर वो घबराया नहीं। पढ़ा-लिखा था। उसे क़ानून की थोड़ी-बहुत जानकारी थी। उसने वकील किया। ज़मानत मिली। केस लड़ा। महीनों बाद कोर्ट ने शिकायत झूठी पाई। पर तब तक नुक़्सान हो चुका था। तनख़्वाह रुकी। माँ-बाप परेशान। दोस्तों ने दूरी बना ली। कुछ ने कहा—

“यार, चुप रहते तो अच्छा था।” 

और दफ़्तर में? विश्वकर्मा जी पहले से ज़्यादा शान से बैठते थे। केस ख़त्म होने के दो हफ़्ते बाद ट्रांसफ़र ऑर्डर आया। नागालैंड। अजय ने पढ़ा। फिर से पढ़ा। उसने गूगल मैप खोला। वो जगह खोजी जहाँ ऑफ़िस था। दीमापुर से छह घंटे गाड़ी। फिर पहाड़ी रास्ता। फिर पैदल। न ट्रेन। न फ़्लाइट। माँ ने पूछा, “कहाँ है यह जगह?” 

अजय ने बताया। माँ चुप हो गईं। 

“बेटा, चला जा। शायद वहाँ ठीक रहे।” 

वो गया। ऑफ़िस एक पुरानी इमारत में था। छत टपकती थी। बिजली दिन में चार घंटे। इंटरनेट का नाम नहीं। सरकारी घर मिला—दीवारें काली, खिड़कियाँ टूटी। उसने मरम्मत के लिए लिखा। कोई जवाब नहीं। छुट्टी माँगी। अस्वीकार। पूर्वोत्तर में दिल्ली वालों से जल्दी कोई घुलता-मिलता नहीं। अकेलापन था। पहाड़ थे। और ख़ुद से सवाल थे। 

“मैंने क्या ग़लत किया?” 

रात को बिजली आती थी। अजय लैपटॉप खोलता था। एक दिन उसने ऑनलाइन पढ़ाई की वेबसाइट का लिंक खोला। सामने सूचना तकनीक के कुछ नए कोर्स की जानकारी थी। कोर्स भी ऐसा, जो पूरी तरह ऑनलाइन किया जा सकता था। उसने सोचा—“क्या पता कुछ काम आए।” 

तीन महीने बाद वो Machine Learning सीख चुका था। छह महीने बाद उसने Python में प्रोजेक्ट बनाए। एक साल बाद उसने LinkedIn पर अपना प्रोफ़ाइल बनाया। उसके कुछ समय बाद अमेरिका की एक कंपनी का मेल आया। 

“We came across your profile. Would you be open to a conversation?” 

अजय ने मेल पढ़ा। फिर से पढ़ा। उसने जवाब दिया। हाँ। 

तीन राउंड हुए। सब ऑनलाइन। पहले राउंड में कोडिंग। अजय ने घंटे भर में सब हल किया। 

दूसरे राउंड में डिज़ाइन। उसने समझाया, सवाल पूछे, जवाब दिए। तीसरे राउंड में HR। 

“Why do you want to leave your current job?” 

अजय एक पल रुका। 

“I want to do meaningful work where my efforts are valued.” 

एक हफ़्ते बाद ऑफ़र लेटर आया। डेढ़ करोड़ रुपए सालाना। अजय ने एक बार ऑफ़र देखा। एक बार बाहर पहाड़ देखे। फिर उसने टाइप किया—

“I accept.” 

अगले ही दिन उसे इस्तीफ़ा दिया। किसी ने नहीं रोका। नोटिस पीरीअड वेव ऑफ़ करके उसे कुछ ही दिन में रिलीव कर दिया गया। सब छुटकारा जो पाना चाहते थे उससे। दिल्ली वापस आया। माँ-बाप से मिला। 

“माँ, अमेरिका जा रहा हूँ।” 

माँ की आँखें भर आईं। 

“अच्छा बेटा। ख़ुश रह।” 

पिता ने कंधे पर हाथ रखा। 

“अजय, तुमने ग़लत नहीं किया। इस व्यवस्था ने तुम्हारे साथ ग़लत किया।” 

अजय कुछ नहीं बोला। हवाई अड्डे पर वो अकेला था। सामान हल्का था। जाते वक़्त उसने एक बार दिल्ली की तरफ़ देखा। न ग़ुस्सा था। न दुख। 

बस एक सवाल था—“अगर मुझे ईमानदारी की सज़ा न मिलती, तो क्या मैं यहीं नहीं रहता?” 

फ़्लाइट उड़ गई। 

दिल्ली के उस दफ़्तर में आज भी सब वैसा ही है। विश्वकर्मा जी वैसे ही बैठते हैं। रामप्रसाद जी वैसे ही अख़बार पढ़ते हैं। सुनीता जी वैसे ही मोबाइल देखती हैं। अजय जिस मेज़ पर बैठता था, उस पर अब कोई और बैठता है। 

अजय अमेरिका में है। काम करता है। लोग उसकी बात सुनते हैं। तरक़्क़ी होती है। वो हर महीने माँ को पैसे भेजता है। हर हफ़्ते वीडियो कॉल करता है। 

एक बार एक दोस्त ने पूछा—“यार, वापस आओगे कभी?” 

अजय हँसा। 

“आना तो चाहता हूँ। पर किसके लिए? जहाँ ईमानदारी को सज़ा मिले, वहाँ ईमानदार आख़िर लौटकर क्यों जाए?” 

फोन कट गया। 

और एक देश अपने ही होनहार बेटे को बाहर धकेलता रहा—चुपचाप, बिना शर्म के। 

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