हिंदी पत्रकारिता में महिलाएँ: 200 साल बाद भी अधूरी यात्रा
आलेख | साहित्यिक आलेख डॉ. शैलेश शुक्ला1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जब 1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन किया, तो यह सिर्फ़ एक अख़बार की शुरूआत नहीं थी। यह हिंदी भाषी समाज के लिए आधुनिकता की खिड़की खुलने का क्षण था। लेकिन इस खिड़की से समाज के आधे हिस्से—महिलाओं—को बाहर का नज़ारा देखने में दो सदी से अधिक का समय लग गया। आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का उत्सव मनाते हैं, तो यह पूछना ज़रूरी है: क्या महिलाओं के लिए यह उत्सव मनाने का समय है, या फिर यह आत्ममंथन का क्षण है?
आँकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। और हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति के आँकड़े एक ऐसी सच्चाई बयान करते हैं जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। नवभारत टाइम्स—जो हिंदी समाचार पत्रों में सबसे बेहतर माना जाता है—में महिला पत्रकारों का प्रतिशत महज़ 23.8% है। पंजाब केसरी में यह आँकड़ा गिरकर 7.7% पर आ जाता है। यानी 100 में से मात्र 8 पत्रकार महिलाएँ हैं। क्या यह स्थिति किसी लोकतांत्रिक समाज के चौथे स्तंभ के लिए स्वीकार्य है?
लेकिन असली त्रासदी तो तब सामने आती है जब हम मुख्य पृष्ठ के लेखों को देखते हैं। हिंदी समाचार पत्रों में केवल 5% मुख्य पृष्ठ के लेख महिलाओं द्वारा लिखे जाते हैं। प्रभात ख़बर में तो यह स्थिति और भी भयावह है—99% लेख पुरुषों द्वारा लिखे जाते हैं। इसका मतलब है कि जो ख़बरें समाज की दिशा तय करती हैं, जो मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते हैं, उनमें महिलाओं की आवाज़ लगभग ग़ायब है। यह सिर्फ़ संख्या का सवाल नहीं है, यह प्रतिनिधित्व का, दृष्टिकोण का और अंततः न्याय का सवाल है।
यदि संख्या की कमी चिंताजनक है, तो नेतृत्व में महिलाओं की अनुपस्थिति विचलित करने वाली है। भारत के शीर्ष हिंदी समाचार पत्रों में 87% संपादक और मालिक पुरुष हैं। यह महज़ एक आँकड़ा नहीं है—यह एक पूरी व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ निर्णय लेने की शक्ति केवल पुरुषों के हाथों में है। मृणाल पांडे को हिंदी दैनिक की पहली महिला मुख्य संपादक बनने में हिंदी पत्रकारिता की शुरूआत के 180 साल लग गए। और उनके बाद? अपवाद ही नियम बने रहे।
समाचार संगठनों में नेतृत्व के पदों पर महिलाओं का प्रतिशत चौंकाने वाला है—समाचार पत्रों में शून्य, समाचार चैनलों में 20.9% और डिजिटल मीडिया में 26.3%। इसका सीधा मतलब है कि संपादकीय निर्णय, ख़बरों का चयन, रिपोर्टिंग की दिशा-सब कुछ पुरुष दृष्टिकोण से तय हो रहा है। महिलाओं के मुद्दे, उनकी चिंताएँ, उनके अनुभव—सब कुछ पुरुषों की नज़र से फ़िल्टर होकर समाज तक पहुँच रहा है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता के लिए भी हानिकारक है।
टेलीविज़न पर महिला एंकरों की संख्या देखकर लगता है कि शायद यहाँ स्थिति बेहतर है। लेकिन यह केवल सतही समानता है। जब हम प्रमुख समय की बहसों में पैनलिस्ट के रूप में महिलाओं की भागीदारी देखते हैं, तो तस्वीर साफ़ हो जाती है। हिंदी समाचार चैनलों पर 52% से अधिक बहसें केवल पुरुष पैनलिस्टों के साथ होती हैं। 981 बहसों में कुल 1,400 पैनलिस्टों में से केवल 232 महिलाएँ थीं—यानी मात्र 16%।
और जब महिलाएँ पैनल में होती भी हैं, तो उन्हें कौन से विषय दिए जाते हैं? मानवीय रुचि, संस्कृति और मनोरंजन। गंभीर विषय जैसे रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था—ये सब पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। मानो महिलाओं को इन विषयों की समझ ही नहीं है। यह रूढ़िवादिता 21वीं सदी में भी जारी है और हम इसे सामान्य मानकर चल रहे हैं।
समस्या केवल संख्या की नहीं है। यह एक पूरी संरचनात्मक व्यवस्था है जो महिलाओं को पत्रकारिता से दूर रखती है। यौन उत्पीड़ण की शिकायत समिति के बारे में 27% पत्रकार अनजान हैं। मातृत्व अवकाश की सुविधाएँ अपर्याप्त हैं। वेतन में भेदभाव सामान्य बात है। पदोन्नति में लैंगिक पूर्वाग्रह स्पष्ट है।
छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली महिलाओं के लिए चुनौतियाँ दोगुनी हैं। परिवार की अनुमति, सामाजिक दबाव, सुरक्षा की चिंताएँ—ये सब मिलकर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देते हैं। और जब वे किसी तरह इस क्षेत्र में प्रवेश कर भी लेती हैं, तो उन्हें ‘गंभीर’ बीट नहीं दी जातीं। राजनीति, वित्त, अपराध-ये सब पुरुषों का इलाक़ा है। महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज के पन्ने मिलते हैं, जैसे कि ये कम महत्त्वपूर्ण हों।
लेकिन अंधकार में भी रोशनी की किरणें हैं। ख़बर लहरिया ने साबित किया है कि जब महिलाओं को अवसर और संसाधन मिलते हैं, तो वे क्या कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से शुरू हुई यह पत्रिका आज पाँच मिलियन लोगों तक पहुँचती है। दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय की ग्रामीण महिलाएँ—जिन्हें समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा—आज मुख्यधारा की पत्रकारिता को चुनौती दे रही हैं।
ख़बर लहरिया की सफलता यह दिखाती है कि समस्या महिलाओं की क्षमता में नहीं, बल्कि व्यवस्था में है। जब मीरा जाटव जैसी महिलाएँ, जो कभी निरक्षर थीं, वरिष्ठ रिपोर्टर बन सकती हैं, तो यह साबित करता है कि केवल इच्छाशक्ति और अवसर की ज़रूरत है। लेकिन ख़बर लहरिया एक अपवाद है, नियम नहीं। और अपवाद पर व्यवस्था नहीं बदलती, संरचनात्मक परिवर्तनों की ज़रूरत होती है।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति अंग्रेज़ी पत्रकारिता से काफ़ी ख़राब है। अंग्रेज़ी समाचार पत्रों में मुख्य पृष्ठ के 31% लेख महिलाओं द्वारा लिखे जाते हैं, जबकि हिंदी में यह आँकड़ा मात्र 5.5% है। यह अंतर क्यों है? क्या हिंदी भाषी समाज में लैंगिक रूढ़िवादिता अधिक गहरी है? क्या हिंदी पत्रकारिता संस्थान अधिक पितृसत्तात्मक हैं?
यह दोहरा भेदभाव है—पहला लैंगिक, दूसरा भाषाई। हिंदी की महिला पत्रकारों को न केवल लैंगिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है, बल्कि उन्हें यह भी साबित करना पड़ता है कि वे अंग्रेज़ी पत्रकारिता की महिलाओं से कम सक्षम नहीं हैं। यह दोहरा बोझ उनकी प्रगति को और धीमा कर देता है।
हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए केवल अच्छी नीयत काफ़ी नहीं है। हमें ठोस क़दम उठाने होंगे। सबसे पहले, संपादकीय नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़ानी होगी। जब तक निर्णय लेने वाली मेज़ों पर महिलाएँ नहीं बैठेंगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा। हर हिंदी समाचार संगठन को लक्ष्य तय करना होगा—अगले पाँच साल में नेतृत्व में कम से कम 30% महिलाएँ।
दूसरा, यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सख़्त नीतियाँ और उनका कड़ाई से पालन। हर संगठन में सक्रिय शिकायत समिति होनी चाहिए और सभी कर्मचारियों को इसके बारे में जागरूक होना चाहिए। तीसरा, मातृत्व अवकाश और लचीले कार्य घंटों की बेहतर सुविधाएँ। चौथा, समान कार्य के लिए समान वेतन-कोई अपवाद नहीं।
लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात है मानसिकता में बदलाव। जब तक हम यह मानते रहेंगे कि कुछ बीट ‘महिलाओं के लिए नहीं हैं’, जब तक हम यह सोचते रहेंगे कि नेतृत्व ‘स्वाभाविक रूप से’ पुरुषों का क्षेत्र है, तब तक कोई नीति सफल नहीं होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विविधता केवल नैतिक रूप से सही नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।
हेमंत कुमारी देवी ने 1888 में जो यात्रा शुरू की थी, वह 136 साल बाद भी अधूरी है। हमने प्रगति की है—इसमें कोई संदेह नहीं। मृणाल पांडे ने काँच की छत तोड़ी, ख़बर लहरिया ने नए रास्ते खोले। लेकिन यह काफ़ी नहीं है। जब तक हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं होगा, जब तक नेतृत्व के आधे पद महिलाओं के पास नहीं होंगे, जब तक हर बीट में महिलाएँ समान रूप से मौजूद नहीं होगी-तब तक यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का जश्न मनाते हुए, हमें यह याद रखना होगा कि यह उत्सव तभी सार्थक होगा जब समाज का आधा हिस्सा भी इसमें पूर्ण भागीदार होगा। महिलाओं को पत्रकारिता में जगह नहीं ‘दी’ जानी चाहिए—यह उनका अधिकार है। और अधिकार माँगने नहीं पड़ते, उन्हें छीनना पड़ता है।
अब समय आ गया है कि हम केवल बात करना बंद करें और कार्य शुरू करें। हिंदी पत्रकारिता के अगले 200 वर्षों की कहानी अलग लिखनी होगी—एक ऐसी कहानी जहाँ महिलाएँ हाशिए पर नहीं, बल्कि केंद्र में हों। यह केवल महिलाओं की लड़ाई नहीं है—यह हिंदी पत्रकारिता की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और प्रासंगिकता की लड़ाई है। और इस लड़ाई में हम सबको साथ आना होगा।
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