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वोट बैंक

 

मास्टर हरिशंकर चालीस साल से पढ़ा रहे थे। गाँव के सरकारी स्कूल में—हिंदू, मुस्लिम, सब उनके छात्र थे। 

उनके लिए कभी कोई फ़र्क नहीं था। 

पर फ़र्क था—ऊपर, नेताओं के बीच। 

चुनाव आने पर नेताजी आए। मदरसे को पचास लाख की घोषणा हुई। पास के सरकारी स्कूल को—जहाँ दोनों समुदाय के बच्चे पढ़ते थे—कुछ नहीं। 

“मास्टरजी, आपके स्कूल को क्यों नहीं?” किसी पत्रकार ने पूछा। 

“वोट बैंक नहीं है हमारे पास।” मास्टर हरिशंकर ने धीरे से कहा। 

इकरामुल—उनका सबसे होनहार मुस्लिम छात्र, अब इंजीनियर—एक दिन मिलने आया। 

“मास्टरजी, हमारे नेता हमें आगे नहीं, पीछे खींचते हैं। मदरसे को पैसा दो, पर डिग्री नहीं दो—ताकि हम हमेशा उन पर निर्भर रहें।”

“तुम समझते हो यह।”

“जो पढ़ा-लिखा है, वह समझता है। इसीलिए नेता नहीं चाहते कि हम पढ़ें।”

हरिशंकर की आँखें भर आईं। 

“तुष्टीकरण और न्याय में फ़र्क होता है, इकरामुल। न्याय सबको आगे ले जाता है—तुष्टीकरण सबको वहीं रोके रखता है, बस पट्टा बदल देता है।”

इकरामुल ने सिर झुकाया। 

“मास्टरजी, काश हमारे नेता भी आपके छात्र होते।”

जो नेता किसी समुदाय को वोट के लिए कमज़ोर रखे—वह उस समुदाय का दुश्मन है, दोस्त नहीं। 

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