होड़ से परे फ़क़ीरी में ठहरा मन
काव्य साहित्य | कविता डॉ. शैलेश शुक्ला15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
आज मन कुछ रुका, कुछ ठहरा सा है,
खिन्न नहीं—मौन में कुछ गहरा सा है।
अध्यात्म ने वाणी को थोड़ा थाम लिया,
ईश्वर की सृष्टि पर चिंतन का काम दिया।
प्रभात की रश्मियों संग चेतना जागी,
वैराग्य की कोई सूक्ष्म सी तान लागी।
संसार से नहीं, उस होड़ से हो रही विरक्ति,
जो हर श्वास से निरंतर छीन रही शक्ति।
यशेषणा, धनेषणा, बलेषणा का बंधन,
आँखों पर कसकर बाँधा गया अंधन।
इन्हीं पट्टियों में हम सब हो अनजाने,
अपनों को धकेल रहे हैं अनजान ठिकाने।
यदि चैन की रोटी से श्रेष्ठ कोई सुख हो,
यदि सुकून की नींद से मधुर कोई क्षण हो—
तो कह देना मुझसे, संकोच न तनिक करना,
उस आनंद के सुख से मेरी झोली भी भरना।
मुस्कुराती आँखें, करुण हृदय का वास,
इनसे सुंदर क्या होगा—पूछती हर श्वास।
ईश्वर ने सब सुख देकर धरती पर उतारा,
हमने ही त्यौरियों का ताज माथे पर सँवारा।
यश का प्रतिफल है मात्र एकाकीपन,
सिंहासन सदा देता है तन्हाई का आँगन।
शिखर जितना ऊँचा, उतनी ही सूनी राह,
ऊँचाई अक्सर बन जाती है आत्मा की चाह।
बुनियाद बोझ उठाकर भी गुनगुनाती है,
कँगूरों की ऊँचाई बस उदासी ही पाती है।
विकास अनिवार्य है, इसमें न कोई विवाद,
पर शान्ति त्याग न हो सकता विकास-संवाद।
कमाने की धुन में स्वयं को इतना क्यों उलझाएँ,
कि ख़र्चने को पल भी शेष न रह पाएँ?
सम्भव है मुझे कल फिर वही दौड़ बुलाए,
पर आज “फ़क़ीरी” का अनहद मन मेरा गाए।
आज मीरा का नर्तन सत्य-सा भाता है,
राणा का वैभव सामने फीका पड़ जाता है।
कैकेयी के सम्मुख श्रेष्ठ हैं वनवासी राम,
आज अधिक अर्थवान, अधिक निष्काम।
प्रेम के एक क्षण पर जीवन वारने वाले,
आज वही विवेकी, वही हैं उजियाले।
कल मन किस कठिन धारा में बह जाएगा,
क्या पता ये मन कब तक यहीं रुक पाएगा?
और जो सफलता के मापों से हुआ मुक्त,
शान्ति को चुनकर, सहज-सरल-विरक्त—
उसके पास ही जग का परम सौभाग है,
उसकी मुस्कान में ही जीवन का राग है।
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