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देवभूमि हिमालय का विलाप

 

मुझे छोड़ दो मेरे ही हाल पे, मैं यूँ ही बेहतर हूँ। 
प्रकृति ही मेरा गहना है, उसे तो बख़्श दो॥
खड़े कर रहे हो तुम जंगल में कंक्रीट के जंगल। 
तुम प्रकृति का ही नहीं, अपना भी कर रहे अमंगल॥
 
जहाँ शांत बहती थीं नदियाँ, वहाँ अब मशीनी शोर है। 
मुनाफ़े की इस अंधी दौड़ का, दिखता न कोई छोर है॥
तुम सुख-सुविधाएँ बेच रहे, दिव्यता यहाँ की दाँव पर। 
कंक्रीट की कीलें ठोक रहे, देवों के पावन पाँव पर॥
पहाड़ों की रूहों को ज़ख्म न दो, तुम इसे व्यापार न समझो। 
ये तीर्थ है, ये इबादत है, इसे महज़ बाज़ार न समझो॥
 
हिमाचल की वो सादगी, और देवभूमि का वो नूर। 
आधुनिकता के इस बोझ से, हो रहा है हम सबसे दूर। 
ऊँची सड़कों के शोर में, खो गई पाइन की वो महक। 
पहाड़ अब काँपने लगे हैं, सुनकर बारूदों की धमक॥
तुम पर्यटन से धन तो कमा लोगे, पर सुकून कहाँ से लाओगे? 
देवभूमि की दिव्यता की कंक्रीट के महलों से कैसे तुलना कर पाओगे? 
जब ये धाम ही न रहेंगे, तो कहाँ जाओगे, सिर कहाँ झुकाओगे? 
 
संस्कृति सुबक रही कोने में, पर्यावरण है व्याकुल खड़ा। 
इंसान स्वार्थ हेतु अपनी ही जड़ें काटने की ज़िद पर अड़ा॥
इन झरनों को कल-कल बहने दो, इन वादियों को जीने दो। 
हिमालय के इस शीतल जल को, अमृत सा ही बहने दो॥
बचा लो अपनी विरासत को, अभी समय भी बाक़ी है। 
वरना क़ुदरत का जो क़हर होगा, उसमें हम सब की लिखी बारी है॥

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