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जेल से घर की ओर

 

साँझ धीरे-धीरे शहर पर उतर रही थी। दिन भर की मेहनत के बाद शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में घर पहुँचने की ख़ुशी थी। ज़िला कारावास के सामने स्थित एक प्लॉट में निर्माण कार्य चल रहा था। उस दिन का काम समाप्त हो चुका था। मिस्त्री अपने औज़ार समेट चुके थे, मज़दूर भी एक-दूसरे से विदा लेकर अपने-अपने घरों की ओर निकल पड़े थे। 
मैंने भी अपनी पुरानी साइकिल उठाई, उसके हैंडल को थामा और घर की राह पकड़ ली।

ज़िला कारावास से शहर की ओर बढ़ते हुए सबसे पहले गुगन राम सिहाग सर्किल आता है। सर्किल के उत्तर दिशा में रेलवे लाइन को पार करने के लिए एक ऊँचा पुल बना हुआ है। रोज़ की तरह मैं साइकिल का हैंडल पकड़कर धीरे-धीरे पुल पर चढ़ रहा था। दिनभर की मेहनत के कारण पैरों में थकान थी, इसलिए साइकिल पर बैठने की बजाय उसे साथ-साथ खींचते हुए चल रहा था।

मैं अभी आधा पुल भी नहीं चढ़ पाया था कि पीछे से एक धीमी, लेकिन विनम्र आवाज़ सुनाई दी, “भाई साहब . . . रेलवे जंक्शन जाना है।”

मैंने पलटकर देखा। लगभग पैंतीस-चालीस वर्ष का एक व्यक्ति था। चेहरे पर थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। कपड़े साधारण थे, बाल बिखरे हुए और आँखों में अजीब-सी उदासी थी। वह ऐसा लग रहा था मानो कई दिनों से चैन की नींद न सोया हो।

मैंने सहज भाव से कहा,  “रेलवे जंक्शन तो बहुत दूर है। आप कोई ऑटो पकड़ लीजिए।”

वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर धीमे स्वर में बोला, “भाई . . . मेरे पास पैसे नहीं हैं। अभी-अभी जेल से छूटा हूँ।”

उसकी बात सुनकर मैं कुछ पल के लिए ठिठक गया।

मैंने पूछा,  “कोई लेने नहीं आया?”

उसने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “नहीं।”

मैंने फिर पूछा,  “क्यों?”

वह बोला, “मेरे मामा ने दादरी कोर्ट से मेरी ज़मानत करवाई थी। वे गुरुग्राम से आए थे। ज़मानत होते ही उन्हें वापस जाना पड़ा। अब यहाँ मेरा कोई नहीं है। रेलवे जंक्शन पहुँच जाऊँगा तो किसी तरह घर चला जाऊँगा।”

उसके शब्दों में न शिकायत थी, न ग़ुस्सा। केवल बेबसी थी।

मैं कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। फिर अनायास मेरी उँगलियाँ जेब में चली गईं। जेब में खुले पैसे टटोले। बीस रुपये निकले। फिर एक सौ रुपये का नोट भी था।

मैंने बिना कुछ कहे बीस रुपये ऑटो के किराए के लिए और सौ रुपये उसके हाथ में अलग से रख दिए।

वह बार-बार मेरी ओर देखता रहा। शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई अनजान व्यक्ति उसके लिए ऐसा भी कर सकता है।

इतने में पीछे से दो-तीन ऑटो निकले। वे अलग-अलग दिशाओं में जा रहे थे। एक ऑटो चालक रुका और बोला, “हांसी गेट तक चलूँगा। वहाँ से दूसरा ऑटो मिल जाएगा।”

उस व्यक्ति ने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में प्रश्न था।

उसने ऑटो चालक से पूछा,  “वहाँ से रेलवे जंक्शन कितनी दूर पड़ेगा?”

वह ऑटो वाला बोला,  “बीस रुपये और लगेंगे।”

मैंने उस व्यक्ति से कहा, “आप सीधे रेलवे जंक्शन जाने वाले ऑटो में बैठिए। पैसे की चिंता मत कीजिए।”

हम दोनों कुछ क़दम आगे बढ़े। पुल समाप्त हो चुका था। नीचे सड़क पर बरसाती पानी भरा हुआ था।

वह पानी को देखते हुए बोला, “लगता है यहाँ बहुत बारिश हुई है।”

मैं मुस्कुराया और कहा, “बरसात इतनी नहीं हुई। यहाँ पानी की निकासी ठीक नहीं है। एक तरफ़ रेलवे का पुल है और दूसरी ओर नदी का पुल। इसी कारण थोड़ा-सा पानी भी सड़क पर भर जाता है।”

इतने में पीछे से एक और ऑटो आता दिखाई दिया। मैंने हाथ देकर उसे रुकवाया।

“रेलवे जंक्शन चलोगे?”

ऑटो चालक ने तुरंत उत्तर दिया, “हाँ, चलूँगा।”

मैंने उस व्यक्ति की ओर देखा।

वह ऑटो में बैठ गया। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी निराशा नहीं थी। जाते-जाते उसने दोनों हाथ जोड़कर ऊँची आवाज़ में कहा, “बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई जी! भगवान आपका भला करे।”

ऑटो धीरे-धीरे आगे बढ़ गया।

मैं कुछ देर तक उसे जाता हुआ देखता रहा। फिर अपनी साइकिल सँभाली और घर की ओर चल पड़ा।

रास्ते भर मन में एक ही विचार घूमता रहा—मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका पद, धन या परिचय नहीं, बल्कि समय पर दिखाई गई उसकी मानवता होती है।

कौन जानता है कि जेल से निकलने वाला वह व्यक्ति किस अपराध में बंद था, परिस्थितियाँ क्या थीं और उसका अतीत कैसा था। लेकिन उस क्षण वह केवल एक असहाय इंसान था, जिसे अपने घर पहुँचने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता थी।

हम अक़्सर लोगों का मूल्य उनके अतीत से तय कर देते हैं, जबकि कई बार उन्हें केवल वर्तमान में एक अवसर और थोड़ी-सी संवेदना चाहिए होती है।

उस दिन मुझे महसूस हुआ कि ईश्वर कभी-कभी हमारी जेब नहीं, हमारा हृदय परखता है। किसी की सहायता करने के लिए बहुत बड़ा धनवान होना आवश्यक नहीं; आवश्यकता केवल इतनी है कि मन में करुणा जीवित रहे।

उस अजनबी का चेहरा आज भी स्मरण है, लेकिन उससे कहीं अधिक याद है उसका वह अंतिम वाक्य—

“बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई जी!”

उस दिन घर तो मैं रोज़ की तरह पहुँचा था, पर मन में एक अलग ही सुकून था। शायद किसी अजनबी की यात्रा आसान बनाकर मैंने अपनी आत्मा की यात्रा को थोड़ा और अर्थपूर्ण बना लिया था। 

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