जीत सदैव स्वाभिमानी है
काव्य साहित्य | कविता अभिषेक देव वशिष्ठ1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
कच्चा मेरा मकान है,
अभी भी पक्का मेरा इरादा है,
तोल–नाप के दोनों भार,
देख दृढ़ता किसमें ज़्यादा है . . .
हार कभी नहीं मानी है,
जीत सदैव स्वाभिमानी है।
हारकर उठा हूँ, उठकर चला हूँ,
विजयपथ पर संघर्ष देख . . .
मेरी मातृभूमि आज अभिमानी है,
समाज के अभिशापों से,
संघर्ष के तापों से,
विजय की अभिलाषा में . . .
आज उठकर चला हूँ मैं . . .
हार नहीं मानी है,
जीत सदैव स्वाभिमानी है।
पर्वत के शीर्ष पर खड़ा हूँ आज मैं,
तू देख मेरे जीवन के संकल्पों को,
गुरुओं का आशीर्वाद ले चला हूँ मैं . . .
हार कभी नहीं मानी है,
जीत सदैव स्वाभिमानी है।
काँटों में रहकर गुलाब-सा हँसा हूँ मैं,
कीचड़ में रहकर कमल-सा खिला हूँ मैं।
समय तो एक बालक है,
संघर्ष ही तुम्हारा पालक है।
हार कभी नहीं मानी है,
जीत सदैव स्वाभिमानी है।
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