मोहब्बत क्या है
काव्य साहित्य | कविता अजय किशोर15 May 2024 (अंक: 253, द्वितीय, 2024 में प्रकाशित)
ये काली आँखें
ये काले बाल
ये सुर्ख़ लाल लब
और ये गेहुँआ रंग
तुझमें कुछ ऐसे ये जँचता है
जैसे बरसात के बाद सूरज लगता है
जैसे ख़ुदा की मेहर सी
जैसे किसी दुश्मन के क़हर सी
जैसे सर्द मौसम में सुबह की सहर सी
जैसे दिवाली की रात हो
जैसे मेहँदी वाले हाथ हों
जैसे चाँदनी रात हो
जैसे तुझ संग नदी किनारे बैठे हो
लगता है जैसे मैं धरा हूँ और
मुझ में मीलों बहुत दूर तक
बेझिझक सी बे-धड़क सी
मौसम की बदमाशियों से बेपरवाह सी
मुझमें रहती एक नहर सी हो
मैं तुझको देखता रहता हूँ
अकेले भी संग तुझे पाता हूँ
वक़्त बे-वक़्त तुझसे कहता रहता हूँ
बदन के नक़्शे पर क़सीदे पढ़ता रहता हूँ
फूल ख़ुशबू माँगता है तुझसे
पानी ने चमकना सीखा है तुझसे
लगता है ये सृष्टि बस तुझसे ही है
तुझसे बस इतना कह पाता हूँ
सब लगता तुझ सा ही है
धरा और अंबर के बीच जितनी जगह है
बस एक चीज़ है जस की तस है
वो मोहब्बत जो तुझसे होती है
मोहब्बत जो तुझसे शुरू तुझ पर ही ख़त्म
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